वेद तो बहुत पढ़ लेते हैं,
वेदना पढ़ सकें तो महत्वपूर्ण है ।

आ. श्री विद्यासागर जी

सत्याग्रही (सत्य के आग्रही) नहीं बनें, सत्यग्राही बनें — विनोबा
सत्य किसे मानें ?
वह सब सत्य है जो सच्चे देव, शास्त्र, गुरु के अनुकूल हो,
(अहिंसा/वीतरागता के अनुकूल हो)

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

साधु की भक्ति देख, प्रियजन डरते/चिड़ाते हैं कि साधु बन जायेगा, पर भगवान की भक्ति करते समय नहीं, ऐसा क्यों ?
क्योंकि साधु बनने की तो संम्भावना है जबकि भगवान बनने की नहीं ।

चिंतन

रेशम का कीड़ा 56 दिन में अपने वज़न से 86000 गुना भोजन खा लेता है ।
ऐसा भुक्खड़ ज़िंदा उबाला जाता है ।
जरूरत से ज्यादा खाने वालों का हाल हमने देखा ही है – अनेक रोगों से पीड़ित रहते हैं ।

चिंतन

धर्म में हमारी दाल क्यों नहीं गल रही ?
क्योंकि हम अपनी दाल को गुनगुने पानी में पका रहे हैं ।
जरा सी गर्मी लगते ही तप की आग बुझा देते हैं ।

(धर्मेंद्र)

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