आओ देखो, जो तुम्हारे पास नहीं है, मेरे पास है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
दूसरों के द्वारा दिये हुये प्रमाण-पत्र से नौकर/भक्त बनते हैं ।
खुद के प्रमाण-पत्र से मालिक/भगवान बनते हैं ।
क्या बेचकर..खरीदें तुझे..
ऐ-“फुर्सत”..
सब कुछ तो..गिरवी पड़ा है..
जिम्मेदारी के..बाजार में…
(ब्र.संजय)
Talk of nothing but business,
and
dispatch that business quickly.
पुण्य की ज़रूरत तब तक, जब तक हमसे पाप हो रहा है । कीचड़ पाप है, इसे साफ करने पुण्य रूपी जल चाहिये,
बिना पानी के शरीर पर कीचड़ सूख जायेगी, चमड़ी उधड़ जायेगी ।
साधु पाप नहीं करते, इसलिये उन्हें पुण्य की आवश्यकता नहीं ।
मुनि श्री सुधासागर जी
भक्तों के द्वारा गुरु की पूजा करते समय गुरु को ध्यान से सुनना चाहिये ताकि अपने आपको उस योग्य बनाये रखने की प्रेरणा मिलती रहे, कमियों को ठीक करने का निमित्त मिलता रहे ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
3 प्रकार के लोग –
- संवेदन शून्य – निष्ठुर
- संवेदन शील – दयालु
- आत्म संवेदन शील – संत पुरुष
जब तक (अपनी कमज़ोरियों के लिये) दूसरों को दोष देते रहोगे – उनके कल्याण और अपने अकल्याण की सम्भावनायें बढ़ती रहेंगी ।
चिंतन
योग से शरीर और मन नियंत्रित, उपयोग से चेतना ।
मुनि श्री सुधासागर जी
मंदिर का शिखर आप लोगों के घर से ऊँचा होना चाहिये ,
वरना धन बढ़ेगा, धर्म कम होगा ।
मुनि श्री सुधासागर जी
स्वाहा = अपनी वस्तु का त्याग,
( फिर ग्रहण नहीं कर सकते )
भगवान ने क्या देखा, इससे हमारा उपकार नहीं होगा,
भगवान ने क्या कहा, उससे होगा ।
मत – व्यक्तिगत,
संप्रदाय – समूह,
धर्म – भगवान के द्वारा निर्धारित ।
हिंसा की हिंसा करना ही अहिंसा है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
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