संसार में मन की बात ज़ुबान पर ना आने देना, ज़ुबान की बात/शरीर पर ना आने देना,
तथा धर्म में मन से वचन, वचन से शरीर की क्रियाओं में लाना ही, साधना है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जिसने घर से पैर निकाल लिया, उसका घर घरोंदा बन गया ।
वही उस घर को लात मार सकता है । *

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* बच्चे अपने-अपने पैरों के ऊपर बड़ी महनत से रेत के घरोंदे बनाते हैं,
पर माँ के बुलाने पर झट से पैर बाहर कर, अपने प्रिय घर को लात मारकर हंसते हुए चले जाते हैं ।

खिले फूलों को देख खुश मत हो जाना,
विकास की सार्थकता तो पराग पर से अंदर की पंखुड़ियाँ हटाना है/खुशबू बिखेरना है ,
संस्कारों की संतति बढ़ाना है।

आ.श्री के प्रवचनों पर आधारित चिंतन

दुर्घटनायें मोड़ों पर कम, सीधी सड़कों पर अधिक होती हैं ।
काँटे वहाँ ज्यादा लगते हैं जहाँ फूल बिछे होते हैं ।
दु:ख सुखों के कारणों से अधिक मिलते हैं जैसे गुटखा !

मुनि श्री सुधासागर जी

सच्चा गुरु मिल जाये तो साधुता निभाना आसान हो जाता है ।
पर सच्चे गुरु की थाह लेना वैसा ही है जैसे कोई रस्सी में नमक का डेला बाँधकर समुद्र की थाह लेना चाहे ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

“योग” मिलते हैं, उनका “उपयोग” अच्छे या बुरे में करना “प्रयोग” है ,
अच्छे में “सदुपयोग”, बुरे में “दुरुपयोग” ।
अच्छा स्वास्थ्य योग है, भोगों में लगना दुरुपयोग, धर्म में लगाना सदुपयोग ।

क्या झगड़े को आधे में रुकवाना न्यायसंगत है ?
क्योंकि एक पक्ष घाटे में रह सकता है !

अग्नि को किसी भी Stage पर बुझाना न्यायसंगत है ।
झगड़ा बढ़ने पर दोनों पक्ष घाटे में रह जाते हैं ।

चिंतन

नियम – कार को Left Side में चलाना,
उपयोग – ध्यान Driving से हटा तो दुर्घटना घटी,
प्रयोजन – कहाँ पहुँचना है !

जिनके जीवन में ये तीनों होते हैं वे ही मंजिल पर पहुँचते हैं ।

पुराने व्यक्ति और टेप रिकार्डर में एक सी समस्या होती है –
दोनों की सुई एक जगह/बात पर अटक जाती है ।
समाधान – जानकार/गुरु की सहायता से निकालना पड़ती है ।

चिंतन

छोटा सा जुगनू पूरे आकाश के अंधकार पर भारी पड़ जाता है ।
हमारे हृदय का अज्ञान भी ज्ञान के दीपक से समाप्त हो सकता है ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पुराने पुण्य को पाप में इन्वेस्ट करने पर पैसा कमाया जाता है ।
तो कम से कम, पाप से कमाया हुए पैसे को पुण्य में इन्वेस्ट करके भविष्य के लिये तो पुण्य संजोलो ।

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