स्वयं को बदलना…कितना कठिन है…
फिर
दूसरे को बदलना…कैसे सरल हो सकता है !
(मंजू)
कुछ चीज़ें ‘कमजोर’ की हिफाज़त में भी ‘महफूज़’ रहती हैं,
जैसे ‘मिट्टी की गुल्लक में लोहे के सिक्के…’
बशर्ते विश्वास हो ।
(सुरेश)
फूंक मार कर दिये को बुझा सकते हैं.!
किन्तु…
अगरबत्ती को नहीं…
क्योंकि
जो ख़ुद को जलाकर दूसरों को सुगंध का अनुभव कराता हो, उसे कोई बुझा नहीं सकता…!!
(मंजू)
सन्मान हमेशा समय का होता है,
लेकिन
आदमी उसे अपना समझ लेता है ।
(मंजू)
गुज़रते दिनों का नहीं..
बल्कि
यादगार लम्हों का नाम है…
ज़िंदगी…
(सुरेश)
इसलिये ऐसे काम करें जिन्हें याद करके गर्व हो/ सुखद अनुभूति हो ।
एक राज्य में राजा अल्पायु ही होते थे ।
राजा के पूछने पर गुरु ने कहा कि जब वो हरा पेड़ सूख जायेगा तब बताऊंगा ।
15 दिन में वह पेड़ सूख गया ।
कारण !
राजा ने भावना भायी थी कि जल्दी सूखे ।
गुरु – राजन! तुम्हारे भावना भाने से हरा-भरा पेड़ सूख गया। ऐसे ही प्रजा तुम्हारे बारे में बुरी भावना रखती है, इसलिये राजा अल्पायु होते हैं ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
हम इतना समझाते हैं पर कोई भी समझता क्यों नहीं ?
चोर चोर की समझता नहीं है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बड़ों की आशिका अपनी ओर लें, ताकि उनके गुण/ज्योति हममें भी आयें,
छोटों (दुल्हे आदि) की अपनी ओर से उनकी ओर करते हैं, ताकि हमारी ऊर्जा उनको मिले ।
मुनि श्री सुधासागर जी
मकान के खंभे में लोहे की छ्ड़ें अकेले सीधी खड़ी भी नहीं रह पातीं, पर सीमेंट के साथ ऊँची ऊँची मंज़िलों को बना देती हैं ।
चिंतन
समाजसेवा क्यों करें ?
समाज की वज़ह से ही हम असमाजिक तत्व बनने से बचे हुये हैं, इसीलिये समाज की सेवा करें ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
पेड़ में मनुष्य के आकार की कल्पना करके उससे उपकार की अपेक्षा, भ्रम टूटने के साथ समाप्त हो जाती है ।
ऐसे ही आत्मज्ञान हो जाने पर संसारी लोगों से उपकार की अपेक्षा भी समाप्त हो जाती है ।
समाधितंत्र गाथा – 22
अज्ञानी का आकर्षण नवीन और विविधता की ओर होता है,
इसीलिये उनमें अस्थिरता रहती है ।
ज्ञानी का पुरातन और स्थाईत्व की ओर रहता है ।
चिंतन
आपको किन्ही दो के बीच में राग दिख रहा है तो मानना आपको द्वेष है,
और यदि द्वेष दिख रहा है तो आपका राग छिपा है ।
रागद्वेष से ऊपर उठना विरक्ति है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
जीवन
जो शेष है,
बस वही विशेष है ।
(सुरेश)
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