दुष्ट घोड़े को जितना रोको उतना ही और ज्यादा दौड़ता है।
ऐसे ही दुष्ट आदमी और दुष्ट मन की भी प्रकृति होती है।
चिंतन
भविष्य वर्तमान का ही तो Extension है।
वर्तमान अच्छा तो, भविष्य अच्छा होगा ही। *
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
* (भूतकाल के दोषों को भी भुला दिया/ क्षमा कर दिया जायेगा)।
दानादि… देव, शास्त्र, गुरु को।
सहयोग……… किसी को भी।
भेंट……… अपने से बड़ों को।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
भगवान महावीर से पूछा…छोड़ा क्या ?
वह जो मेरा था ही नहीं।
घर का आसान पता है कि घर है ही नहीं।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं… इच्छा तथा संकल्प शक्तियाँ।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

(रेनू- नया बाजार-ग्वालियर)

आचार्य श्री विद्यासागर जी
(…ऐसी प्रकृतियों का बंध होता है…)।
विशालता जिसकी कोई सीमा ना हो जैसे आकाश/ विचार/ भगवान का सुख, ज्ञान।
एक रूप/ न वृद्धि/ न ह्रास।
संसारी सुख कम-ज्यादा इसलिए विशाल नहीं।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
साधु का “जियो” कमज़ोर*, गृहस्थ का “जीने दो”।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
* अपने शरीर पर ध्यान कम, आत्मा/ धर्म/ समाज पर अधिक।
अनन्त संख्या को कैसे समझें ?
अनन्त वह जिसमें आय न हो, सिर्फ़ व्यय ही व्यय हो पर संख्या अनन्त रहे,
जैसे भविष्य आज अनन्त है, अनन्त काल के बाद भी अनन्त रहेगा।
(जैसे विज्ञान में इंफिनिटी – इंफिनिटी = इंफिनिटी)।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जब कण-कण में भगवान है तो मंदिर जाना क्यों ?
हवा तो धूप में भी पर उसका आनंद छाँव में ही क्यों / कार में हवा भरवाने पंपिंग स्टेशन पर जाते क्यों !
(श्रीमती शर्मा – पुणे)
- संसारी सुख…
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- हर सुख के पीछे दु:ख जैसे भोजन बनाने में दु:ख, उसे सुख की आशा कि परिवारजन खुश होंगे।
- दु:ख का प्रतिकार ही सुख है जैसे रोग दूर करने के लिए औषधि।
- इच्छा की पूर्ति पूरी न होने पर दु:ख, पूरी/ अधूरी पूर्ण होने का सुख।
छोटी-छोटी इच्छा पूर्ति होने की संभावना ज्यादा, पूरी न होने पर निराशा भी कम।
-
- सच्चा/शाश्वत सुख …आत्मिक/ भगवान का।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
सांकृत्यायन जी ने लिखा है…मोक्ष घुमक्कड़ों को ही होता है।
क्योंकि उनका कोई व्यक्तिगत/ स्थायी ठिकाना नहीं होता, बहुत दिन ठहरे पानी में तो कीड़े पड़ जाते हैं।
ब्र. डॉ. निलेश भैया

(रेनू- नया बाजार मंदिर)
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