शिष्य…कौन सी आदत अच्छी, कौन सी बुरी और यह जीवन में कैसे आती हैं ?
गुरु ने कुटिया के एक तरफ औषधि के पौधे बुववाये, दूसरी ओर को खाली छोड़ दिया। कुछ दिनों बाद औषधि के पौधों को बड़ा करने में बहुत मेहनत करनी पड़ी, खाली जगह में खरपतवार अपने आप उग आई।
अच्छी आदतों/ पुण्य के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है। बुरी आदतें/ पाप बिना पुरुषार्थ के जैसे गुस्सा करना कोई सिखाता नहीं है।

ब्र. डॉ. निलेश भैया

क्या भगवान के ज्ञान में आधुनिक उपकरण मोबाइल आदि नहीं था?
यदि था तो उन्होंने ऐसे सुविधाजनक उपकरणों के बारे में बताया क्यों नहीं?
पिता बच्चों से उन चीज़ों को छुपा कर रखता है जिनके बुरे साइड इफेक्ट्स होते हैं, दुर्भाग्य बच्चों ने उसे ढूंढ निकाला है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

एक गाँव में सब स्वस्थ। सम्मान करने अधिकारी आये। पर एक व्यक्ति मरियल सा दिखा।
ये कौन है ?
ये गाँव का डॉक्टर है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… “स्वोपकारी ही परोपकारी” हो सकता है।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

बड़ों के प्रति नम्रता कर्तव्य है,
तो हम-उम्र के प्रति विनय की सूचक,
अनुजों के प्रति कुलीनता की द्योतक एवं सबके प्रति सुरक्षा है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पाँचों पाप रोग-रूप हैं।
हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं। बाहर से कोई इलाज नहीं कर सकता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!),
पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),
तब भी कम से कम आखिरी बोगी तो पकड़ लो, अगले स्टेशन (जन्म में) पर 1st बोगी (साधु अवस्था) में आ जाना।

चिंतन

साधना की पृष्ठभूमि…….विरक्त्ति,
आराधना की पृष्ठभूमि…अनुरक्त्ति,
शब्द अपने आप में…अभिव्यक्त्ति,
मौन…………………… व्यक्त्ति है।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

संसार तथा परमार्थ में विकास के लिये …

  • एक आदर्श होना चाहिये जैसे भगवान।
  • आदर्श को समझने के लिये गुरु का अवलम्बन ज़रूरी है।
  • उनके बताये रास्ते पर चलने के लिये आचरण चाहिये ( इसमें साधर्मीजनों की मुख्य भूमिका रहती है। वे सद्मार्ग पर चलने में सहायक तथा अकेलापन महसूस नहीं होने देते )।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

छोटों को महत्व…
इकाई से ही दहाई आदि बड़ी-बड़ी संख्यायें बनतीं हैं।
इकाई को महत्व नहीं देंगे तो दहाई बनेगी कैसे !

मुनि श्री सुप्रभसागर जी

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

October 2026
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031