• सुबह सबके कल्याण की प्रार्थना करें
  • मंदिर में भगवान के गुणों का गुणगान
  • रात्रि में आत्मचिंतन

आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

प्रभु!
पर्वत के चरणों में रहने वाली जमीन को चाहे तलहटी कहलाने का गौरव मिलता हो,
परन्तु,प्रभु!
आपके चरणों में रहने वाले भक्त को तो आपका ही पद मिल जाता है।

सुख तात्कालिक होता है ।
हित कागज़ों में लगे पिन जैसा होता है जो जोड़कर तो रखता है पर चुभता भी है ।
क्यों ना हम Clip बन जाय – सुखकारी भी, हितकारी भी ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जीवन में जब भी हम ख़राब दौर से गुजरते हैं… तब मन में यह विचार ज़रूर आता है कि…

परमात्मा मेरी परेशानी देखता क्यों नहीं है !
मेरे दुःख कम क्यों नहीं करता !!
पर याद रखना…
जब परीक्षा चल रही होती है, तब शिक्षक मौन रहता है !

(मँजु)

ज्ञान पूर्ण नहीं तो धर्म को भी अपूर्ण मानें ?
ज्ञान अभिव्यक्ति है इसलिये अपूर्ण, धर्म अनुभूति है इसलिये पूर्ण ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

लोग मेरी कमियाँ बताते हैं तब मेरा भी मन करता है – मैं भी उनकी कमियाँ बताऊँ, पर बता नहीं पाता, क्योंकि मुझे उनमें कमियाँ दिखती ही नहीं ।

श्री लालमणी भाई

(और दिख भी जाती हैं तो बता नहीं पाता, उन्हें दु:ख होगा)

जब जल गंदा हो जाता है
तो उसे हिलाते नहीं, शांत छोड़ देते हैं ,
धीरज रखते हैं…….,
गंदगी अपने आप नीचे बैठ जाती है….
साफ जल अपने आप ऊपर आ जाता है…..

इसलिये जो धीरज रख सकता है,
वह अपना इच्छित सब कुछ पा सकता है….

स्पीडब्रेकर कितना भी बड़ा हो,
गति धीमी करने से झटका नहीं लगता ।

उसी तरह मुसीबत कितनी भी बड़ी हो,
शांति से विचार करने पर, जीवन में झटके नहीं लगते ।

???? सुरेश ????

डॉक्टर के पास दर्शनार्थी बनकर जाओगे तो इलाज नहीं हो पायेगा, शरणार्थी बनने पर ही लाभ होगा ।
ऐसे ही गुरु/भगवान के पास शरणार्थी बनकर जाने में ही लाभ होगा ।

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