विचारों/भावनाओं को नियंत्रित करना कठिन है, क्रियाओं को आसान ।
पर भावनायें और क्रियायें आपस में Connected रहती हैं ।
सो क्रियाओं में प्रसन्नता दर्शायें, चिंतायें/भावनायें अपने आप सुधर जायेंगी ।

(श्रीमति शर्मा)

जोकर अपने आपको कलाकार मानता है, पर दुनिया जोकर ! ऐसा क्यों ?
क्योंकि उसका आचरण जोकर जैसा है ।
इसीलिये दुनिया को हंसाता है/दुनिया उस पर हंसती है, पर वह कभी नहीं हंस पाता ।

धन होने पर धनी कहलाते हैं, ज्ञान होने पर ज्ञानी !
पर ज्ञान तो कीड़े मकोड़ों को भी होता है ?
उनका ज्ञान गुजारे भर के लिये होता, जीवन निर्माण के लिये नहीं ।
पहले ज्ञानी बनो, फिर उसका चिंतन करो, तब अनुभूति होगी ।

मुनि श्री समयसागर जी

धर्मानुराग – धर्म के प्रति ऐसा अनुराग जो विपत्ति में भी बना रहे ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

(अंधानुराग – अधर्म को भी धर्म का नाम देकर अनुराग/श्रद्धा सहित करना,
संसानुराग – आत्मा का अहित करनेे वाले संसारियों से अनुराग बनाये रखना)

बुराईयों में आकर्षण होता है,
बुरे लोगों के अचेतन मन में भय रहता है, इसलिये वे संगठित रहते हैं ।

अच्छों में प्राय: घमंड़ आ जाता है और जिनमें नहीं आता वे स्वाबलंबी होते हैं तथा मोक्षमार्ग पर अकेला ही चला जाता है ।

लॉकर की दो चाबियाँ हैं, अमूल्य निधी दोनों के लगने पर ही मिलेगी ।
पुरुषार्थ की चाबी हमारे पास है, भाग्य की मैनेजर के पास ।
अपनी चाबी लगाते रहना, पता नहीं कब मैनेजर अपनी चाबी लगा दे ।

(धर्मेंद्र)

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