ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है कि ना तो हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं ,
और ना ही स्वयं को लात मार सकते हैं।
इसलिए हमारे जीवन में मित्र और आलोचक होने ज़रुरी हैं ।

(शशि)

जनसाधारण जन्म से खुश, मरण से डरता है;
साधुजन मृत्यु का महोत्सव मनाते हैं, जन्म से डरते हैं (गर्भ की पीड़ा/बार-बार जन्म से) ।

मुनि श्री सुधासागर जी

जीवन/संगीत/पूजा सब में उचित अनुपात बहुत जरूरी है, तभी आनंद आयेगा, क्रिया कार्यकारी होगी । अनुपात बिगड़ा, आपात स्थिति आती है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

चोर साधुओं के पास इसलिये नहीं जाते, क्योंकि उनके पास वह सब नहीं है जो उन्हें चाहिये ।
यदि हम भी उनके पास नहीं जा रहे है हैं तो हम क्या हुए !!

मुनि श्री सुधासागर जी

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April 8, 2022

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