1) रावण बनना भी कहाँ आसान !
रावण में अहंकार था तो पश्चाताप भी था,
रावण में वासना थी तो संयम भी था,
रावण में सीता के अपहरण की ताकत थी
तो बिना सहमति परायी स्त्री को स्पर्श न करने का संकल्प भी था,
सीता जीवित मिली ये राम की ताकत थी,
पर पवित्र मिली ये रावण की मर्यादा थी ।
हे राम !
तुम्हारे युग का रावण अच्छा था..
दस के दस चेहरे, सब “बाहर” रखता था..
महसूस किया है कभी उस जलते हुए रावण का दुःख ?
जो सामने खड़ी भीड़ से बार बार पूछ रहा था…..
“तुम में से कोई राम है क्या ??
(पारुल-देहली)
आज तो रावण पर तीर चलाने वाले सब नकली राम हैं (रामलीला के) ।
2)हर रावण को जलाने से पहले हम ही तो उसे बनाते हैं/उसे ख़ुद खड़ा करते हैं।
(डॉ.एस.एम.जैन)
गुरु ने मुझे क्या ना दिया !
हाथ में “दीया” दे दिया !!
आचार्य श्री विद्यासागर जी
देव, गुरू, शास्त्र को साधन ही नहीं, साध्य बनाएँ ।
मुनि श्री सुधासागर जी
दुःख जिसे मन स्वीकार ना करे,
कष्ट जिसे मन स्वीकार कर ले ।
कुत्ता नये लोगों पर ही भौंकता है ।
हम पुरानी बातों पर भी ।
चिंतन
बुराई छोड़ी नहीं जाती, उनके प्रति तो जगा जाता है ।
छोड़ी तो बुरी प्रवृतियाँ जाती हैं ।
व्यवस्थागत आजादी तो मिल गयी है पर अवस्थागत नहीं (संस्कारों से आजाद नहीं) ।
अहम् ने एक वहम पाल रखा है,
सारा कारवां…
मैंने ही सँभाल रखा है !
(धर्मेंद्र)
मैं
परिवर्तन में जीता हूं
और
मौत से बेहद डरता हूं
(हालाँकि मौत भी बदलाव है)
यह सोचकर
कि शाश्वत में जीना-मरना
दोनों मुश्किल हैं…
गुरुवर मुनि श्री क्षमा सागर जी
मुँह में मिश्री डालकर…
चाहे घूमें,
चाहे बैठ जायें,
चाहे लेट जायें ।
पर जब तक मुँह में मिश्री है तब तक मुँह मीठा रहेगा ।
इसी प्रकार सुमिरन है ।
जब हम चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, यानि हम जिस स्थिति में भी हों,
सुमिरन करते रहेंगे, तो उस मिश्री की तरह नाम का मिठास हमारी आत्मा को आता ही रहेगा ।
(नीलम)
लंबी अवधि की संगति से ही संस्कार बनते हैं ।
चिंतन
जो Best पुरुषार्थ के बाद शेष रह जाये, वह नियति है ।
चिंतन
युवावस्था के विकल्प वृद्धावस्था/मरणावस्था के समय बहुत प्रबल बनकर उभरने लगते हैं, क्योंकि उस समय और कुछ करने को रहता ही नहीं है ।
“शब्द” मुफ़्त में मिलते हैं ।
लेकिन
उनके चयन पर “निर्भर” करता है,
कि
उनकी क़ीमत “मिलेगी”
या
“चुकानी” पड़ेगी ..
(अंजू जैन)
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