कर्म बछड़े जैसे हैं, जो 100 गायों में छिपी अपनी माँ को ढ़ूँढ़ ही लेता है ।

जीवन एक “गणित” है।
साँसें
“घटती” हैं,
अनुभव
“जुड़ते” हैं ।

अलग अलग
“कोष्ठकों*” में
बंद हम
बुनते रहते हैं
“समीकरण**”,
लगाते रहते हैं
“गुणा-भाग”।

जबकि
अंतिम सत्य है
“शून्य” ।

(डॉ.अमित राजा)

* Bracket
** Equation

भगवान ने गृहस्थ के षटकर्मों में खेती, शिल्प, लेखनादि बताये हैं पर नौकरी नहीं बतायी ।
ये तो दासता है, इसी को अधम चाकरी कहा है ।

मुनि श्री सुधासागर जी

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