एक शिष्य ने अपने गुरूजी से पूछा – ” नष्ट होने वाले इस शरीर में, नष्ट ना होने वाली आत्मा कैसे रहती है ? ”

गुरूजी का कहा :- वत्स ! जिस तरह दूध उपयोगी तो है किन्तु एक ही दिन के लिए,
फिर वह बिगड़ जाता है ।

दूध में एक बूंद छाछ की डालने से वह दही बन जाता है,
जो फिर एक और दिन टिकता है ।

दही का मथने से उसका मक्खन बन जाता है,
यह भी एक और दिन टिकता है ।

मक्खन को उबालने से घी बनता है,
और घी कभी भी नहीं बिगड़ता है ।

जिस तरह से एक दिन में बिगड़ने वाले दूध में कभी ना बिगड़ने वाला घी छिपा होता है ।

इसी तरह से अशाश्वत शरीर में शाश्वत आत्मा रहती है ।

मानव शरीर, दूध समान
दैवीय स्मरण, छाछ समान
सेवा भाव, मक्खन समान
तथा
साधना करना घी समान होता है ।

मानव शरीर को साधना से पिघलाने पर आत्मा पवित्रता प्राप्त करती है ।

(अभिषेक-देहली)

एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद लाखों मछलियाँ किनारे पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! एक बच्चे से रहा नहीं गया,
और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेंकने लगा !
यह देख कर उसकी माँ बोली…
बेटा लाखों की संख्या में हैं, तू कितनों की जान बचाएगा, रहने दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
बच्चे ने एक और मछली को समुद्र में फेंकते हुए कहा… माँ इसको तो फ़र्क पड़ता है न ?

लोगों को हमेशा हौसला और उम्मीद देने की कोशिश करें, न जानें कब आपकी वजह से किसी की ज़िंदगी बदल जाए !
क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता,
पर,
“उसको तो फ़र्क पड़ता है”  ।

(रजनी)

फिर उड़ गयी नींद ये सोच कर,,,
सरहद पर बहा वो खून मेरी नींद के लिये था…!

2) उम्र जन्नत में रह कर, उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,
और जिहाद बस इस बात की थी, कि मरने के बाद जन्नत मिले…

हरिवंशराय बच्चन जी की एक ख़ूबसूरत कविता,

“रब” ने नवाज़ा हमें ज़िंदगी देकर,
और हम “शौहरत” माँगते रह गये ।
ज़िंदगी गुज़ार दी शौहरत के पीछे,
फिर जीने की “मोहलत” माँगते रह गये ।।

2) ये समुंदर भी दुनिया की तरह खुदगर्ज़ निकला,
ज़िंदा थे तो तैरने न दिया मर गए तो डूबने न दिया

3) जो सामने है उसे लोग बुरा कहते हैं,
जिसको देखा नहीं उसे सब “ख़ुदा” कहते हैं ।

(सुरेश)

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