आईना साफ़ किया तो “मैं” नज़र आया,
“मैं” को साफ़ किया तो “तू” नज़र आया ।

(नीलम)

भगवान, गुरु, शास्त्रों से;
माँ और बड़ों से, उनके बताये हुए मार्ग पर न चल पाने के लिये;
अपने आप से, जीवन सही तरीके से न जी पाने के लिये;
संसार के सब जीवों से, जाने/अनजाने में हुई ग़लतीयों के लिये;
क्षमा भाव ।

2) रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार,
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार ।

(ब्र.निलेश भय्या)

3) दिल में बसी नफ़रत को मिटा देना भी,
एक स्वच्छता अभियान है ।

(आर.के.गुप्ता)

आत्मा में रमना ही सच्चा ब्रम्हचर्य है ।

प्रवचन पर्व (आ.श्री विद्या सा.जी)

2) बेटे और पति के शरीरों पर हाथ रखने से जब एकसा महसूस हो तब पूर्ण ब्रम्हचर्य मानें ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमा सा.जी

“यह मेरा है”
ऐसे भाव का त्याग करना ही आकिंचन्य धर्म है ।

2) मछली पानी के बाहर आने पर मरने का एक कारण आक्सीजन की अत्यधिक मात्रा भी होती है, मनुष्य भी शुध्द आक्सीजन नहीं ले सकता ।

वैभव की अधिकता भी हमारे लिये ऐसा ही कारण बन जाती है ।

मोह को छोड़कर संसार, देह और भोगों से उदासीन परिणाम रखना त्याग धर्म है ।

बारसाणुवेक्खा-78

2) दान और त्याग में अंतर –
* दान प्रवृत्ति है , त्याग निवृत्ति  ।
* दान शुभ भाव है, त्याग शुद्ध भाव ।
* दान स्वर्ग का कारण है, त्याग मोक्ष का कारण ।
* दान साधन है, त्याग साधना  ।
* दान बहिरंग है, त्याग अंतरंग  ।
* दान असमझ पूर्वक हो सकता है किन्तु त्याग समझ पूर्वक ही होता है ।
* दान आंशिक दिया जाता है, त्याग पूर्ण का होता है ।
* दान श्रावक करता है, त्याग मुनियों के द्वारा  ।

मन,वचन,काय का सदुपयोग ही संयम है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

2) एक बड़ा ही शरारती बच्चा था। उसे दिन-भर खेलना , टी वी देखना और बढ़िया खाना, पीना ही पसंद था । उसकी माँ उसे बहुत समझाती, पर वह कभी न सुनता।
एक बार उनके घर के सामने से एक पुलिस अधिकारी एक कैदी को लेकर निकला। दोनों के साथ 5-5 सैनिक चल रहे थे, लेकिन जहाँ पुलिस अधिकारी के पांचों सैनिक उसके पीछे चल रहे थे और उसके सभी आदेशों का पालन कर रहे थे, वहीं कैदी को उन पाँचों सैनिकों के पीछे चलना पड़ रहा था और उनके आदेशों का पालन करना पड़ रहा था।
माँ ने बेटे को यह सब दिखाकर पूछा – बताओ , तुम इन दोनों में से क्या बनना चाहते हो ! पुलिस अधिकारी या कैदी ?
बेटे ने कहा- बेशक, मैं पुलिस अधिकारी बनना चाहुँगा।
तब माँ ने उसे समझाते हुए कहा-फिर तो तुम्हें अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण करना पड़ेगा , तभी तो ये तुम्हारी बात मानेंगी , तुम्हारे पीछे चलेंगी और यदि तुमने इन्हें नियंत्रण करना नहीं सीखा तो तुम्हें इनकी बात माननी पड़ेगी , इनके पीछे दौड़ना पड़ेगा और तब तुम अपने मन और इन्द्रियों के कैदी मात्र बनकर रह जाओगे।

कहते हैं “सत्य कड़वा होता है”,
पर वास्तविकता यह है कि सत्य कड़वा हो ही नहीं सकता ।
यदि कड़वा होता तो भगवान तो सदैव असत्य-वचन ही बोलते क्योंकि भगवान कभी कड़वे वचन बोल ही नहीं सकते और उन्होंने तो सत्य के अलावा कुछ बोला ही नहीं !
सचाई यह है कि हम सत्य को कलुषता के लिफाफे में रख कर pass-on करते हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

पवित्रता,
जो लोभ के अभाव में/संतोष से आती है,
और
शरीर की पवित्रता, गुणों से/तप से आती है ।

2) एक कंजूस सेठ गड्ढ़े में गिर गया । लोग उसे ऊपर खींचने के लिये, उसका हाथ माँग रहे थे पर वह हाथ नहीं दे रहा था, बस “बाहर निकालो” की रट लगाये जा रहा था ।
उसको जानने वाला एक व्यत्ति आया, उसने सेठ से हाथ माँगा तो सेठ ने तुरंत हाथ दे दिया और सेठ को बाहर खींच लिया गया ।

जिसने कभी किसी को कुछ भी न दिआ हो,
वह अपनी जान बचाने के लिये भी अपना हाथ भी नहीं दे सकता ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

मायाचारी का अभाव ।

2) ईमानदारी, उन्मुत्त हृदय, स्पष्टवादिता, सादगी, भोलापन, सरलता ही आर्जव धर्म है ।

ईमानदारी की नाव पर तो हम सब सवारी कर रहे हैं पर उसमें बेईमानी के अनेकों छेद हैं,
जिन्हें सफेद/स्वच्छ कपड़े से ढके रहते हैं ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

3) जोकर तो एक मुखौटा पहनता है,
जो सबको दिखता है,
पर हम तो अनेकों मुखौटे पहनते हैं और किसी को दिखने भी नहीं देते ।

4) दोहरा जीवन जीने वाले, दोहरे stress में रहते हैं ।

“म”  से मान का
“द” से दमन,
“व” से विनम्रता द्वारा ।

2) मार्दव धर्म का प्रारम्भ होगा…
भगवान के सम्मान / गुणगान से,
फिर गुरु / शास्त्र तथा माता पिता के से,
इनके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाये रखने से ।
और अंत में छोटों को सम्मान देने से ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

3) मान त्रिकोणा घेरा है जो तीनों से मिलने नहीं देता…
* भगवान से
* संसार से
* अपने आप से भी ।

4) आसमां पे ठिकाने किसी के नहीं होते,
जो जमीं के नहीं होते वो कहीं के नहीं होते..

5) झूठी शान के परिंदे ही ज्यादा फड़फड़ाते हैं …
बाज़ की उड़ान में कभी आवाज़ नहीं होती ।

 

1) क्रोध आने के कारण…
* मनोवृत्ति
* आसक्ति
* अपेक्षा

गुरवर श्री क्षमासागर जी

2) क्रोध पर क्रोध करने से क्रोध कम नहीं होगा,
क्षमा रूपी दीपक के प्रकाश में क्रोध का अंधकार पास नहीं आ पायेगा ।

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