एक घर से बहू लाये, दूसरे घर में बेटी दी।
लगाव किसकी तरफ ज्यादा ?
दूसरे की तरफ, जहां बेटी दी थी।
कारण ?
जहाँ दिया जाता है वहाँ लगाव/ खिंचाव ज्यादा होता है।
Offence पाप/ हिंसा है,
Defence पुण्य/ अहिंसा।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
युवा तथा वृद्ध तपस्या में लीन थे।
एक देव आये, दोनों ने जिज्ञासा रखी कि हमको मोक्ष कब होगा ?
देव… वृद्ध तपस्वी तीन भव से मोक्ष जा सकते हो।
यह सुन, दुखी हो कर वृद्ध ने तपस्या छोड़ दी कि तीन भव और शेष हैं।
युवा जिस इमली के पेड़ के नीचे तपस्या कर रहे हैं, उनको इतने भव लग सकते हैं।
युवा आह्लादित हो गये कि मेरा संसार सीमित हो गया। उसी पेड़ के नीचे ध्यानस्थ हो गये। पेड़ के पत्ते गिरना शुरु हो गये।
मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
सुकून भी ढूँढना पड़े तो इससे बड़ा और कोई दर्द नहीं…!
यदि तुम में खुद को बदलने की हिम्मत नहीं,
तो तुम्हें भगवान या किस्मत को कोसने का हक भी नहीं…!!
धनजी भाई – भोपाल
विवाह विषयों के निमंत्रण के लिये नहीं, नियंत्रण के लिये।
विवाह दवा है, इसे भोजन मत बनाना।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
ईश्वर को आखिरी उम्मीद नहीं, पहला भरोसा बनाइये।
मुनि श्री अविचलसागर जी
दो प्रकार के लोग →
1. स्वस्थानिक – जो अपनी आत्मा में रहते हैं।
बड़ों से पूछो → कहाँ रहते हो ?
जबाब – ग्वालियर, आगरा, दिल्ली, मुंबई आदि।
बच्चों का जबाब – जी, अपने घर में।
2. परस्थानिक – जो पर के पीछे भागते हैं। यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो जसलोक (मुम्बई का अस्पताल) से परलोक की यात्रा करते हैं, अंत धार्मिक नहीं।
*जस = यश।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
शब्द पंगु हैं,
जबाब न देना भी
लाजबाव है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
पापोदय में पाप करते हैं यह तो समझ में आता है पर पुण्योदय में भी पाप करते हैं इसका क्या कारण ?
सुभाष – महगांव
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… पुण्य के फल में यदि असावधानी बरती तो पाप करोगे/ पाप हो जाएगा।
जितना बड़ा पुण्योदय होगा उतनी ही ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ेगी जैसे भगवान बनने वालों को।
मुनि श्री सौम्य सागर जी- 10 फरवरी (शंका-समाधान)
दूर बुद्धि* भी एक प्रकार की दुर्बुद्धि है।
* बहुत ज्यादा और बहुत दूर की प्लानिंग करना।
– ब्र डॉ नीलेश भैया जी
संसार की बनावट है कि अभाव और उपलब्धि साथ-साथ चलती हैं।
एक खरगोश किसान के खेत से रोज गाजर खाता था। बाड़ लगाने पर रोज आकर पूछता –> “गाजर है”।
किसान ने पकड़ लिया, दाँत तोड़ दिये।
गाजर बचने लगीं, हलवा बनने लगा।
अब खरगोश पूछता है –> “हलवा है”।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
हम सब उत्पाद हैं, चेतना + पदार्थ (शरीर) के।
चेतना, विचारपन देती है/ चाहना बढ़ाती है, गणित लगाती है, दुःख की निमित्त(कारण) है*।
पदार्थ… विस्तारपना जैसे शरीर को बनाये रखने/ बढ़ाने के लिये रोटी, कपड़ा, मकान; आवश्यक।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
* दृष्टिकोण बदल जाए तो सुख कारण भी।
क्या महिलाओं को नौकरी करनी चाहिए ?
(यदि इमरजेंसी हो तो) चाकरी को अधम कहा गया है। नौकरी में पराधीनता है जबकि सुख स्वाधीनता में ही है। जॉब में अनेकों संक्लेश होते हैं।
बच्चों के लिए पहली पाठशाला माँ है।
आप गवर्नर क्यों नहीं बनते जैसे माॅल का मालिक, ‘अरनर'(Earner) क्यों होना चाहते हो जैसे सेल्समैन !
मुनि श्री सौम्य सागर जी- 11 फरवरी
भगवान की मूर्ति के दर्शन पहले खुली आँखों से करें, उनके रूप को अपने अंतस् में भर लें। फिर आँख बंद करके उस रूप का आनंद लें।
वह रूप मन में टिकेगा तब जब आपके कान और मन बंद हों।
मुनि श्री सौम्य सागर जी- 10 फरवरी
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