सबसे बड़ा विश्वसनीय कौन ?
जो अच्छे और बुरे की जिम्मेदारी खु़द लेते हों और इसमें अग्रणी हैं, मुनिराज। जो अनजाने में हुई गलतियों के लिए भी दिन में तीन बार प्रतिक्रमण करके अपने को दोषी स्वीकारते हैं।
जो बुरे का ज़िम्मा ले वह गुरु और जो अच्छे का ही ज़िम्मा ले वह ग़ुरूर कहलाता है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 6 मार्च)
मोक्षमार्ग में….
- कारण …बीज/ संसार। पेड़ पौधे तक कारण हैं क्योंकि वे हमें संसार में जिंदा रखने में सहायक है। इसलिये उनके प्रति उदार-चित्त रखना होगा उधार-चित्त (*Split Personality) नहीं।
- कार्य …फल/ सिद्धि (मोक्ष)।
ब्र.(डॉ.) नीलेश भैया
*Split Personality -हम अपनों के प्रति तो इतना दया भाव रखते हैं , मनुष्य जाति के प्रति दया भाव भी रखते हैं, (थोड़ा बहुत ) पर पेड़ पौधों, तिर्यंच के लिये नहीं जो हमारे जीवन के आधार हैं।
ऐसी स्वानुभूति करो कि किसी की सहानुभूति की आवश्यकता ही न रह जाये।
आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)
साधु को स्वादु होना चाहिए।
जैसा भी मिले स्वाद लेकर खाना चाहिए।
मुनि श्री मंगलानंद सागर जी
बड़ा पापी वह, जिसके मन से पश्चाताप का भाव ही समाप्त हो जाए।
पश्चाताप से ही प्रायश्चित ग्रहण होता है।
ब्र. (डॉ.) नीलेश भैया
ना “श्री” भटकाती है, ना ही “श्रीमती”, बस “मति” भटकाती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी (आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी)

(रेनू-नयाबाजार)
जानवर राग तथा द्वेष में एक सी भाषा बोलते हैं (जैसे कुत्तों का भौंकना)।
मनुष्य राग में तो राग/ मोह करता ही है, द्वेष का कारण भी राग/ मोह होता है।
चिंतन
शेर की +ve Thinking थी कि उस पर कोई मुसीबत नहीं आ सकती।
लेकिन उसके पास Power Thinking नहीं थी, मुसीबत किसी पर भी आ सकती है।
उस समय के लिये चूहे से दोस्ती जरूरी थी।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

(मंजू-रानीवाला)
दो मिलते जुलते शब्द हैं सेलफिशनेस और दूसरा सेल्फओरिएंटेड। तुच्छ उपलब्धियां के पीछे भागना सेल्फिश्नेस है जबकि सेल्फओरिएंटेड को उच्च उपलब्धियां मिलती हैं। निःस्वार्थ सेवा सेल्फओरिएंटेड ही कर सकता है, सेल्फिश तो कहेगा क्यों करूँ ?
मुनि श्री सौम्य सागर जी (डाक्टर सम्मेलन – प्रवचन – 2 मार्च)
दुःख में साक्षी भाव कैसे रखें ?
पक्षियों की दृष्टि बना लें। ऊपर से जब वे गंदे नाले को देखते हैं, वह भी सुंदर दिखता है। अपने आप को इतना ऊपर उठा लो कि बुराइयाँ भी बुरी न दिखें।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 2 मार्च)
गेंद कीचड़ में फेंकी तो दिखेगी नहीं जैसे मकान में लगा हुआ पैसा।
बालू पर फेंकोगे तो लौटेगी नहीं, पर दिखेगी… दुकान में लगा पैसा।
दीवार पर फेंकी तो उतनी ही तेजी से लौट कर आएगी… धर्म में लगा पैसा।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 मार्च)
एक सेठ ने अपने अंतिम समय में विशाल मीनार बनवाना शुरू किया। अलग-अलग प्रांतों से सबसे बेहतरीन ठेकेदारों को बुलाया गया। 1 साल का समय दिया। आर्थिक आदि किसी तरह की रुकावट नहीं थी फिर भी 3 महीने तक प्रगति नहीं हुई।
कारण ?
जब ईंट मांगी जाती तो पत्थर आ जाता क्योंकि अलग-अलग प्रांतों की भाषाएँ अलग-अलग हैं।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा होता है,फिर राष्ट्रीयता कैसे आएगी!
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 मार्च)
Pages
CATEGORIES
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत – अन्य
- प्रश्न-उत्तर
- पहला कदम
- डायरी
- चिंतन
- आध्यात्मिक भजन
- अगला-कदम
Categories
- 2010
- 2011
- 2012
- 2013
- 2014
- 2015
- 2016
- 2017
- 2018
- 2019
- 2020
- 2021
- 2022
- 2023
- 2024
- 2025
- 2026
- News
- Quotation
- Story
- Uncategorized
- अगला-कदम
- आध्यात्मिक भजन
- गुरु
- गुरु
- चिंतन
- डायरी
- पहला कदम
- प्रश्न-उत्तर
- वचनामृत – अन्य
- वचनामृत – मुनि श्री क्षमासागर
- वचनामृत-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण – मुनि श्री क्षमासागर
- संस्मरण – अन्य
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
- संस्मरण-आचार्य श्री विद्यासागर
Recent Comments