जब गरीब तथा अमीर नितांत अकेले पैदा व मरते हैं, कुछ लेकर नहीं आते हैं तो गरीबी/अमीरी के लिए दोषी कौन ?
भगवान को दोष क्यों ?
अपने कृत/ कर्मों को दोषी क्यों नहीं ठहराते !

(धर्मेंद्र)

जीना है तो जीने दें, वरना जीना सम्भव नहीं हो पायेगा।
दूसरे को मारा नहीं सो अहिंसा पर दूसरे को बचाया नहीं तो अहिंसा का पालन नहीं।

गुरुवर मुनि श्री क्षमा सागर जी

घड़े में पानी हो तो बाहर संकेत दिखते हैं/ स्पर्श करने पर शीतलता महसूस होगी ही।
अंतरंग में गुण/ ज्ञान/ चारित्र हो तो बाह्य में झलकेगा ही।

(विजय कमावत)

(ऐसे ही अवगुण भी बाहर झलकेंगे ही)

भगवान के ज्ञान को जैसे का तैसा समझना/ समझाना चाहिये।
नमक मिर्च लगाने से भोजन का असली स्वाद/ सत्य समाप्त हो जाता है, स्वास्थ्य/ आत्मा के लिये स्वास्थ्यवर्धक/ कल्याणकारी नहीं रह जाता है।

खोई वस्तु को योग्य स्थान ( जहाँ वस्तु खोई हो) पर ही ढूंढ़ना चाहिये।
यदि वहाँ अंधकार हो तो स्थान को प्रकाशित (ज्ञान) कर लें।

बिगड़े हालातों को सुधारने का भी कारगर उपाय ज्ञान (कर्म-सिद्धांत) ही है।

Fire Place में बीच में एक लकड़ी का बड़ा टुकड़ा जल रहा था। आसपास छोटे-छोटे टुकड़े धीरे-धीरे जल रहे थे।
बड़े टुकड़े को हटा दो तो छोटे-छोटे जल्दी बुझ जाते हैं,
छोटों को हटाने पर बड़ा भी ज्यादा देर प्रकाश/ गर्माहट नहीं दे पायेगा।

(ज्योति-देहली)

शेर का मुखौटा लगा कर बच्चा माँ को डरा नहीं पाता क्योंकि माँ तो असली चेहरे को जानती है।
भगवान भी तो असली चेहरे को जानते हैं, कम से कम भगवान/ गुरु के सामने तो मुखाटा उतार कर जायें !

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

राजा को 3 मूर्तियाँ बहुत प्रिय थीं। सेवक से एक मूर्ति टूट गयी।
राजा ने मृत्युदंड दे दिया।
सेवक ने बाकी 2 मूर्तियाँ भी तोड़ दीं।
कारण ?
मूर्तियाँ तो किसी से भी/ कभी भी टूट सकती हैं, तब राजा 2 और सेवकों को फांसी देंगे।
राजा ने सेवक का धैर्य/ विवेक/ दया भाव देख, उसे माफ़ कर दिया।

(एन.सी.जैन- नौएडा)

दया का कथन ज़ुदा है, करन ज़ुदा।
अब तो कृपाण पर भी गुदा रहता है → “दया धर्म का मूल है”,
जबकि कृपाण के तो, नाम में ही उसका काम छुपा है → कृपा+न (ण)।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Label बाह्य और Level* अंतरंग, प्राय: अलग-अलग।
बाह्य का Label मिट भी जाय तो भी अंदर की दवा काम करेगी। Label कितना भी सुंदर हो पर दवा का Level न हो तो कारगर नहीं।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

* स्तर

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