जो परिवार में सबका, वह परिवार का मुखिया;
जो समाज में सबका, वह गुरु;
जो संसार में सबका, वह भगवान।

चिंतन

धन से नहीं, मन से अमीर बनें,
क्योंकि
मंदिरों में स्वर्ण कलश भले ही लगे हों लेकिन नतमस्तक पत्थर की सीढ़ियों पर ही होना पड़ता है।

(सुरेश)

(महत्व मूल्य का नहीं, उपयोगिता का है >>> सीढ़ियाँ ऊपर उठाती हैं/ भगवान के पास ले जाती हैं)

घर में पेंट करते समय कारीगर ने रंग दिखा कर सहमति चाही।
बुढ़ापे में वैसे तो नज़र भी कमज़ोर हो जाती है;
दूसरा – अच्छे बुज़ुर्गों को सब अच्छा लगता है, बुरों को सब बुरा।

चिंतन

दर्पण को ना*,
दर्पण में देखो ना**,
निर्दोष होने।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* बाह्य/ Frame/ दर्पण की Quality.
** दर्पण में अपने दोषों को देखो।

मान को प्राय: हम बो* देते हैं, फिर मान की फसल लहराने लगती है।
साधुजन उसे बौना कर देते हैं तब वह न वर्तमान में न भविष्य में पीड़ा देता है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

* संरक्षण

कंकड़ को आँख के बहुत करीब ले आओ तो पहाड़ सा दिखेगा।पहाड़ को दूर से देखो तो कंकड़।

समस्याओं के साथ भी ऐसा ही होता है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

सम्बंधियों को याद करोगे तो दु:ख होगा/ कर्मबंध होगा। यह कहना कि उनके गुणों को/ उपकारों को याद करते हैं, यह भी पूर्ण सत्य नहीं, याद तो मोहवश ही किया जाता है।
बचें कैसे ?
सच्चे गुरु/ भगवान को याद करें, उनमें गुण भी बहुत और उनके उपकार भी ज्यादा तथा कर्मबंध की जगह कर्म कटते हैं।

चिंतन

राजा ने भूमि-दान में ब्राम्हणों को बहुत ज्यादा-ज्यादा भूमि दी क्योंकि वे विद्वान होते हैं, अन्य जाति वालों को कम। एक लुहार ने राजा से भूमि माँगी – हथौड़े से कान तक के बराबर।
जब एक मीटर भूमि उसे दी जाने लगी तब उसने जोर से हथौड़ा शिला पर मारा और कहा – हथौड़ा यहाँ, इसकी आवाज़ जहाँ-जहाँ तक कानों में पड़ी चारों ओर की भूमि मेरी।
राजा को अपनी ग़लती का एहसास हो गया कि बुद्धिमत्ता किसी जाति विशेष की नहीं होती है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

एक चोर साधु की कुटिया को खुला देखकर, चोरी करने घुस गया।
कुछ न मिलने पर लौटने लगा।
साधु… “आये हो तो एक माला फेर लो।”
चोर माला फेरने लगा।
उसी समय राजा गश्त पर निकला, कुटिया का दरवाजा खुला देखकर अंदर आया।
दोनों को ध्यान में देख अपना हार चढ़ा गया।
साधु ने हार चोर को दे दिया।
चोर …थोड़ी देर के गुरू-सानिध्य से कीमती हार मिला, पूरे समय के सानिध्य से मालामाल क्यों न हो लूं !
वह शिष्य बन गया।

मुनि श्री विशालसागर जी

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