वैदिक दर्शन में गांधारी ने दुर्योधन के शरीर को वज्र जैसा बनाने के लिये उसे दिगम्बरत्व धारण करने को कहा। अपूर्णता के कारण पूरा शरीर वज्र का नहीं बन पाया था।
इस दर्शन ने भी दिगम्बरत्व के महत्त्व को स्वीकारा है।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
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दिगम्बरत्व को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दिगम्बरत्व अपनाना परम आवश्यकता है।
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दिगम्बरत्व को परिभाषित किया गया है वह पूर्ण सत्य है। अतः जीवन के कल्याण के लिए दिगम्बरत्व अपनाना परम आवश्यकता है।