Category: पहला कदम
दोष
1. अतिक्रम –> मन की शुद्धि में कमी। 2. व्यतिक्रम –> मन से मर्यादा उलंघन। 3. अतिचार –> अज्ञान/ प्रमादवश विषय में प्रवृत्ति। 4. अनाचार
द्वितियोपशम सम्यक्त्व
द्वितियोपशम सम्यक्त्व के साथ कौन से स्वर्ग में जाते हैं ? पहले से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक, किसी में भी। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
प्रमाद / हिंसा
कोई व्यक्ति सिर्फ बैठा है, इसमें हिंसा कैसे घटित होगी ? प्रमाद में बस बैठने से अपने समय/ मन का दुरुपयोग कर रहा है। भाव/
ऋषभनाथ भगवान
ऋषभनाथ भगवान का चिन्ह बैल नहीं, क्योंकि बैल तो नपुंसक होता है। उनका चिन्ह है “वृषभ” (सांड़)। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
मैं
जिसमें मेरी आत्मा नहीं, वह “मैं” नहीं। (जैसे मकान, रिश्तेदार आदि) क्षु. श्री सहजानंद जी
आत्मा
आत्मा एकत्व(अपने में पूर्ण लीन), विभक्त(अन्य से भिन्न) रूप है। क्षु. श्री सहजानंद जी
भक्ति
शुद्धोपयोग में शुद्ध की अनुभूति, भक्ति में भगवान बनने की। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
अनर्थदण्ड विरत
अनर्थदण्ड विरत = मन, वचन और काय की कुचेष्टाओं का त्यागी अनर्थ = निष्प्रयोज्य दण्ड = मन, वचन और काय की कुचेष्टायें विरत = उदासीन,
पद्मासन मूर्ति
प्राय: पद्मासन मूर्तियाँ क्यों ? तप भी इसी मुद्रा में ? पैर जमीन से नकारात्मक ऊर्जा लेते हैं। पद्मासन में पैर तथा हथेलियाँ ऊपर की
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