Category: पहला कदम
राग-द्वेष
राग की बहुलता हो तो द्रव्य-दृष्टि कर लेना, द्वेष में पर्याय-दृष्टि। मुनि श्री मंगलसागर जी
रागद्वेष / ध्यान
आर्त/रौद्र-ध्यान तथा राग-द्वेष में क्या अंतर है ? दीपा-मुम्बई राग-द्वेष कारण हैं, आर्त/रौद्र-ध्यान कार्य। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
आलोचना आदि दोष
आलोचना… स्वयं के दोषों को दूर करना/ दूर करने के लिये। गर्हा……….. दोषों से घृणा करना। निंदा……….. बुरा कहना। तीनों स्वयं के लिये प्रशंसनीय, पर-प्रत्यय
पुण्य
पुण्य का तो संचय करना चाहिये; पुण्य के फल का त्याग। पर होता उल्टा है, फल तो चाव से खाते हैं, पुण्य करते नहीं/ करना
सम्यक्त्व / मिथ्यात्व
संसार में अभव्यों से बहुत ज्यादा भव्य। लेकिन मिथ्यात्वी अनंत, जबकि सम्यग्दृष्टि बहुत कम। कारण ? अज्ञान/ विनय मिथ्यात्व। चिंतन
संवत्
क्या शुरू के तीर्थंकरों के समय संवत् होते थे ? नहीं, क्योंकि उनकी आयु बहुत ज्यादा होती थी। बस तिथियाँ होती थीं। (पहले केवलज्ञानी भी
संज्ञा / क्रिया
संज्ञा तो हर संसारी जीव में पायी जाती हैं (10वें गुणस्थान तक)। पर जब वे क्रिया रूप में परिवर्तित होती हैं तब घातक हो जाती
तत्त्व चर्चा
जिनको तत्त्वों में श्रद्धा न हो, उनके साथ तत्त्व चर्चा करने से –> वचन व्यय। संताप। अपवाद (कुप्रभावना तथा धर्म की अविनय होती है)। आर्यिका
भरत / बाहुबली
बाहुबली जी के दीक्षा के समय हालाँकि भरत मौजूद थे। पर उन्हें बाहुबली जी कि एक साल के उपवास/तप के नियम के बारे में पता
निगोद जाना/आना
तीव्र मिथ्यात्व/पाप निगोद जाने के कारण हैं। निकलने के कारण –> त्रस आयुबंध + कषाय की मंदता। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (शंका समाधान – 25)
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