Category: पहला कदम
ज्ञान
कम से कम ज्ञान निगोदिया को। जिसे “नित्य उद्घाटित ज्ञान” कहते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8)
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य व्रत … आलम्बन सहित। ब्रह्मचर्य धर्म … आलम्बन रहित। (नीलेश भैया – सांगानेर)</span
जैन धर्म
जैन धर्म महान क्यों ? जैन धर्म ने भगवान बनाये। अन्य मतों में भगवान, धर्म बनाते हैं। आर्यिका सुयोग्यनंदनी माताजी
अध्यात्म
अध्यात्म… संकल्प… मैं शरीर हूँ। विकल्प… शरीर के सुख-दु:ख से सुखी-दुखी। इन संकल्प/ विकल्प से दूर होना अध्यात्म। भेद-विज्ञान जानना, मानना तथा अनुभव में लाना।
असंयम
जितना राग, उतना द्वेष। इंद्रिय असंयम से ही प्राणी असंयम जैसे द्विदल से। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/01)
दिगम्बरत्व
वैदिक दर्शन में गांधारी ने दुर्योधन के शरीर को वज्र जैसा बनाने के लिये उसे दिगम्बरत्व धारण करने को कहा। अपूर्णता के कारण पूरा शरीर
पूजा
पूजा के अंत में “इत्याशीर्वाद” बहुत महत्त्वपूर्ण है। पूजा का फल –> प्रभु का आशीर्वाद (प्रभु के गुण पाने हेतु)। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी</span
प्रमाद
8 प्रकार की शुद्धि(काय, भाव, भाषा, विनय, ईर्यापथ, भैक्ष, शयनासन, प्रतिष्ठापन) की कमी से प्रमाद आता है। प्रमाद से बचने के लिए 5 समिति, 3
अतिशय
अतिशय भक्तों की भक्ति से होते हैं, भगवान/ गुरु नहीं करते। भगवान के 34 अतिशय भक्तों के काम के नहीं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
बुद्धि / अबुद्धि
पुरुषार्थ, विकास, विनाश बुद्धि पूर्वक तो होते ही हैं, अबुद्धि पूर्वक भी होते हैं। जैसे भरत चक्रवर्ती के 923 पुत्रों ने निगोद से मोक्ष तक
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