Category: पहला कदम

विपाक

विपाक = फलानुभूति। भेद –> जीव विपाक = फलानुभूति जीव को जैसे ज्ञानावरणादि। पुद्गल विपाक = फलानुभूति पुद्गल के माध्यम से जैसे नामकर्म। क्षेत्र विपाक

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पूजादि

पूजादि 6 आवश्यक, मोक्षमार्ग की पर्याय हैं। चिंतन

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उपयोग

श्रावक श्रमण की तुलना में अधिक सत्य बोलते हैं। कैसे ? श्रावक से पूछो, “बुखार है?” श्रावक- “है।” किन्तु श्रमण कहेगा, “नहीं।” “पर शरीर तो

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व्रत / विरति

व्रत विधि है, विरति निषेध। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी (विरति, व्रत का फल है)।

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माँगना

कल्पवृक्ष किसी से कुछ नहीं माँगते। जो अपने को मानते हैं/ अपने से ही माँगते हैं, वे ही केवलज्ञानी बनते हैं। क्षु. श्री सहजानन्द जी

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आत्मा

जो दिखती सी है पर दिखती नहीं, वह आत्मा है। चिंतन

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तीर्थंकर

दो और तीन कल्याणक वाले तीर्थंकरों में गुण ? अंतरंग तो सबमें अनन्त चतुष्टय हैं। बाह्य के गर्भ, जन्म के अतिशय नहीं होंगे। निर्यापक मुनि

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धर्मांधता

श्री गोपाचल (ग्वालियर) में सैकड़ों विशाल प्रतिमाओं का निर्माण धर्मांधता से सम्भव था। उनका विध्वंस भी धर्मांधता से ही सम्भव था। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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द्रव्य / पर्याय

द्रव्य तो सबका ज्ञानमय है। पाँचों ज्ञान सब में, प्रकट ज्ञानी के। पर्याय बदलने पर ही द्रव्य का मूल जैसे पत्थर में सोना‌, इंजीनियर तो

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साता

श्रावकों के असाता में पाप-बंध ही होता है (अपवादों को छोड़कर)। साता में पापबंध और पुण्यबंध, दोनों। चिंतन

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मंगल आशीष

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