Category: पहला कदम

दिव्यध्वनि

दिव्यध्वनि से ज्ञान तो मिलता ही है। इससे आहारदान भी क्योंकि भूख नहीं लगती। औषधि दान भी, क्योंकि बीमारी नहीं आती। अभयदान, क्योंकि वहाँ डर

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पाप

पाप भी दो रूप –> विनाश रूप। विकास रूप/ समाज की मान्यता प्राप्त। जैसे कानून के तहत फाँसी, सूकर शेर को मारकर ५वें स्वर्ग गया,

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श्रावक

आचार्य श्री विद्यासागर जी के दर्शन करने एक धनाढ्य व्यक्ति आये। आचार्य श्री –> सेठ जी आ गए ? सेठ –> सेठ नहीं महाराज, भक्त।

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दृढ़ता

जिनके अंदर दृढ़ता होती है, वे ही देशव्रत/महाव्रत ले पाते हैं और उन्हें पाल पाते हैं। पर यह भी देखा गया है कि कुछ लोग

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पुद्गल विपाकी

अगुरूलघु, उप/पर घात, रसादि, आतप, उद्योत, प्रत्येक/ साधारण, शुभ/ अशुभ, स्थिर/ अस्थिर आदि 62 प्रकृतियाँ पुद्गल विपाकी हैं। ऐसे चिंतन से रागद्वेष कम होता है

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द्रव्य / तत्त्व

सभी जीव द्रव्यों का तत्त्व तो एक ही है। पर चिंतन सबका नहीं, एक अपने जीव-तत्त्व का करना है। सो द्रव्य सब, तत्त्व एक। आर्यिका

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विपाक

विपाक = फलानुभूति। भेद –> जीव विपाक = फलानुभूति जीव को जैसे ज्ञानावरणादि। पुद्गल विपाक = फलानुभूति पुद्गल के माध्यम से जैसे नामकर्म। क्षेत्र विपाक

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पूजादि

पूजादि 6 आवश्यक, मोक्षमार्ग की पर्याय हैं। चिंतन

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उपयोग

श्रावक श्रमण की तुलना में अधिक सत्य बोलते हैं। कैसे ? श्रावक से पूछो, “बुखार है?” श्रावक- “है।” किन्तु श्रमण कहेगा, “नहीं।” “पर शरीर तो

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मंगल आशीष

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June 3, 2026

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