Category: पहला कदम

रागद्वेष

(शुद्ध) आत्मा में तो रागद्वेष होता ही नहीं है। कर्म (वर्गणा) में भी नहीं, वे तो Neutral होती हैं, रागद्वेष उनमें हम भरते हैं। चिंतन

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सम्यग्दर्शन

चरणानुयोग के अनुसार सम्यग्दृष्टि का संसार लगभग अनन्त। करणानुयोग के अनुसार संसार बहुत थोड़ा सा, क्योंकि वह छटपटाता है। संसार कैसे भी छूटे ! निर्यापक

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कर्म-फल

पुलिस जब सज़ा देती है तो दिखाई देती है तथा उनका डंडा भी, वेदना तो होती ही है। देवता दिखते नहीं सिर्फ़ डंडा दिखता है,

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तप

श्रावक का तप –> अभक्ष्य त्याग से तप शुरू। रात्रिभोजन त्यागादि से तप बढ़ता चला जाता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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संगति

संगति –> निमित्त-नैमित्तिक संबंध। संगति से परिणाम, परिणाम से कषाय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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स्वाध्याय

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –> लोग क्रमबद्ध-पर्याय की बात तो करते हैं जिसका शास्त्रों में नाम भी नहीं है। पर “क्रमबद्ध-स्वाध्याय” की बात

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ज्ञान

अवरोधों को दूर कर ज्ञान पाने में हमको मेहनत करनी पड़ती है, सम्यग्ज्ञानी को नहीं; क्योंकि यह आत्मा का स्वभाव है। क्षु.श्री सहजानन्द जी

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आहार

सन् 1991 में मुक्तागिरी में आहार के बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी ने शिष्यों को कहा –> पंचम काल है आहार के लिए उठना तो

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मूलनायक

मूल –> मुख्य, जो प्रतिमा वेदी के बीच/ ऊपर विराजमान हो। मूलनायक का वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता। अकृत्रिम चैत्यालयों में तो एक वेदी पर

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अज्ञान

ज्ञान के पहले “अ” लगने पर अज्ञान। जीव के पहले “अ” लगने पर “अजीव। सो अज्ञान का संबंध अजीव से हुआ। जितनी अजीव की जानकारी,

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मंगल आशीष

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