Category: पहला कदम
स्वाध्याय
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –> लोग क्रमबद्ध-पर्याय की बात तो करते हैं जिसका शास्त्रों में नाम भी नहीं है। पर “क्रमबद्ध-स्वाध्याय” की बात
ज्ञान
अवरोधों को दूर कर ज्ञान पाने में हमको मेहनत करनी पड़ती है, सम्यग्ज्ञानी को नहीं; क्योंकि यह आत्मा का स्वभाव है। क्षु.श्री सहजानन्द जी
आहार
सन् 1991 में मुक्तागिरी में आहार के बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी ने शिष्यों को कहा –> पंचम काल है आहार के लिए उठना तो
मूलनायक
मूल –> मुख्य, जो प्रतिमा वैदी के बीच/ ऊपर विराजमान हो। मूलनायक का वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता। अकृत्रिम चैत्यालयों में तो एक वेदी पर
अज्ञान
ज्ञान के पहले “अ” लगने पर अज्ञान। जीव के पहले “अ” लगने पर “अजीव। सो अज्ञान का सम्बंध अजीव से हुआ। जितनी अजीव की जानकारी,
एकेंद्रिय
पाँचों एकेंद्रिय हमारे जीवन के आधार हैं। विडम्बना –> सबसे ज्यादा दोहना/ विराधना इन्हीं की करते हैं। हम तो इनसे क्षमा माँगने योग्य भी नहीं
पापी / पुण्यात्मा
स्वर्ग 19 (16+3), नरक 7 ही, तो क्या पुण्यात्मा ज्यादा पापी कम होते हैं ? पुण्यात्माओं के महल आदि ज्यादा बड़े-बड़े होते हैं। नारकी एक-एक
पहाड़ों की ऊँचाई
विदेह, भरत तथा ऐरावत क्षेत्रों में पहाड़ 5 हजार धनुष से ज्यादा ऊँचे नहीं होते। इसलिये भगवान जब विहार करते हैं तो ये रुकावट नहीं
सदवस्थारूप उपशम
सदवस्थारूप उपशम… सत्ता के कर्मों का असमय में उदय में नहीं आने देना। श्री मरणमंडिका
कषाय
हम सम्यग्दृष्टि हैं या मिथ्यादृष्टि, कैसे पता लगे ? यदि समय के साथ कषाय घट रही है तो सम्यग्दर्शन हो गया या होने वाला है,
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