Category: पहला कदम

मानुषोत्तर पर्वत

मानुषोत्तर पर्वत पुष्कर-द्वीप के ठीक मध्य में नहीं है। बल्कि मनुष्य-लोक का आधा भाग निकल जाने/ पूरा हो जाने के बाद में है (मनुष्य की

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Self-dependent / Independent

Self-dependent/Independent तो दो ही हैं… एक सिद्ध भगवान और दूसरा आकाश द्रव्य। मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र-अध्याय 3 – अगस्त 30)

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आस्रव / संवर

आचार्य श्री विद्यासागर जी का एक चिंतन… जैसे आस्रव का निरोध संवर है वैसे ही यह भी कहा जा सकता है कि संवर का निरोध

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मार्दव धर्म

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… मार्दव धर्म मेज के कोने जैसा है, जिनको गोल कर दिया गया हो। इससे खुद भी सुरक्षित और

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कर्म / दुःख

कर्म दुःख दे सकता है पर दुखी नहीं कर सकता वरना कर्म तो 10वें गुणस्थान के ऊपर भी हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन

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चतुष्टय

स्वचतुष्टय = स्व(द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव)। स्वचतुष्टय से ही अनंतचतुष्टय । भाव ठीक नहीं पर दोष गढ़ते हैं बाकी 3(द्रव्य, क्षेत्र, काल) पर। अपनों के

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सूतक

सूतक में दर्शन करने तो जाते ही हैं यानी फर्श को छूते हैं, जो नवदेवता में से एक है। फिर फर्श पर रखी हुई चीजें

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क्षायिक-दान

सिद्धों में क्षायिक-दान कैसे घटित करेंगे ? सिद्धों को ध्यान/ अनुभूति में अपने पास लाकर अभय का अनुभव कर। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र

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समर्पण

समर्पण में अपने व्यक्तित्व, अस्तित्व को मिटाया जाता है। जैसे आचार्य श्री समयसागर जी ४० वर्ष तक आचार्य श्री के संघ में मौनी बनकर रहे।

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वचन / भाषा

दो इन्द्रिय से पाँच इन्द्रिय तक वचन/ भाषा अक्षरात्मक तथा अनक्षरात्मक भी होती है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 2/3)

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मंगल आशीष

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