Category: पहला कदम

पाठ्यक्रम

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने तत्त्वार्थ सूत्र, समयसार आदि के बाद मूलाचार पढ़ाया। आ.श्री की चर्या ही मूलाचार थी (पहले प्रैक्टिकल दिखाए ताकि समझ में

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केवली के निर्जरा

ऐसा लगता है कि 13वें गुणस्थान में आखिरी अंतर्मुहूर्त को छोड़कर सविपाक निर्जरा ही होती है। चिंतन

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मन

द्रव्य-मन… पौद्गलिक, भाव-मन… आत्मा की परिणति। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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“पर”

“पर” को अपना मानने की आदत नहीं छूट रही तो “पर” के घर आदि को अपना मान कर देख लो। क्षु. सहजानंद जी

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विद्याधरों को विद्या

विद्याधरों को 5 विद्याएँ कुल-परम्परा से मिलती हैं। आगे सिद्ध करके/ छीनकर ली जाती हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीवकांड गाथा – 360 )

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भगवान का श्वेत रक्त

प्रथमानुयोग के अनुसार भगवान का श्वेत रक्त होता है (5 कल्याणक वालों का)। लेकिन सिद्धान्त ग्रंथों में ऐसा वर्णन नहीं आता है। निर्यापक मुनि श्री

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परिणमन

परिणमन पर-निमित्तक भी तथा स्व-निमित्तक भी। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब बदलते रहते हैं, लेकिन दर्पण को आकाश की ओर कर दें तब भी दर्पण में

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जिन

जिन की भक्त्ति, जिन जिन ने की है, वे जिन बने। निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी

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तप

तप/ ताप (गर्मी) से हम बहुत घबराते हैं। जबकि ताप के बिना न अनाज आदि पैदा होगा, ना ही उसे पचा (जठराग्नि) पाएंगे। आचार्य श्री

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जिनवाणी

जिनवाणी तो नय रूप है । लेकिन इसके निमित्त से सम्यग्दर्शन/ ज्ञान प्रमाण रूप प्राप्त किया जा सकता है । मुनि श्री मंगलसागर जी

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मंगल आशीष

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