Category: पहला कदम
आत्मा
आत्मा एकत्व(अपने में पूर्ण लीन), विभक्त(अन्य से भिन्न) रूप है। क्षु. श्री सहजानंद जी
भक्ति
शुद्धोपयोग में शुद्ध की अनुभूति, भक्ति में भगवान बनने की। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
अनर्थदण्ड विरत
अनर्थदण्ड विरत = मन, वचन और काय की कुचेष्टाओं का त्यागी। अनर्थ = निष्प्रयोज्य। दण्ड = मन, वचन और काय की कुचेष्टाएँ। विरत = उदासीन,
पद्मासन मूर्ति
प्राय: पद्मासन मूर्तियाँ क्यों ? तप भी इसी मुद्रा में ? पैर ज़मीन से नकारात्मक ऊर्जा लेते हैं। पद्मासन में पैर तथा हथेलियाँ ऊपर की
इन्द्रिय-विजय
रामकृष्ण मिशन के साधुओं ने आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा… “इन्द्रिय-विजय कैसे करें?” “इन्द्रियों को इन्द्रियों का काम करने दो।” “वो तो हम करते
ज्ञान
सामान्यजन का ज्ञान प्राय: धारावाहिक/ पुनरावृत्ति वाला होता है। यही सही है (चाहे झूठ ही क्यों न हो) मिथ्याज्ञान है, क्योंकि संयोगपने से पैदा होता
चेतना
कर्म-फल चेतना का अनुभव… कि मैं हूँ। फल भोगना सुख-दु:ख की अनुभूति तो सब जीवों में होती है, कीड़ों में भी। कर्म-चेतना (कर्ता भाव) संज्ञियों
धर्मात्मा
धर्म शुरु में काँटों* से बचने को कहता है। आगे चलकर फूलों** से भी। चिंतन *अशुभ से। **शुभ/ सुख-सुविधा।
आहार
1991 के मुक्तागिरी के चातुर्मास में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने मुनियों को सम्बोधन दिया… दुर्भाग्य है कि पंचमकाल में आहार के लिए रोज़ उठना
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