Category: पहला कदम
सम्यग्दर्शन के अंग
सम्यग्दर्शन के पहले 4 अंग/ भाव (निशंकितादि) स्वाश्रित हैं। अगले 4 (उपगूहनादि) पराश्रित। यदि पहले 4 संभाल लिए तो अगले 4 आसानी से संभल जाएँगे।
नि:शल्यो व्रती
नि:शल्यो व्रती…. इसमें अणुव्रती/ महाव्रती दोनों आ जाएँगे। मोक्ष का भाव रखने वाले के शल्य समाप्त हो जाती है। जैनेतर व्रत ले सकते हैं पर
लोक
लोक…. जितनी भी आकाशगंगा (गैलेक्सीज़) देखी जा सकीं हैं, उनसे बहुत ज़्यादा। जितने चाँद, तारे दिख रहे हैं, उनसे असंख्यात् गुणे, यह हुआ मध्यलोक। चाँद
उत्पाद / व्यय / ध्रौव्य
उत्पाद = जन्म, पैदाइश। व्यय = नाश, ख़र्च। ध्रौव्य = नित्यता, स्थिरता। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
एकल विहार
दो मुनि साथ रहकर भी सारी क्रियाएँ अलग-अलग कर रहे हों तो भी भगवान की आज्ञा (एकल विहार नहीं कर रहे) मानने से असंख्यात गुणी
अनुजीवी
“अनु” = अनुरूप/ उनमें हमारे प्राण। “जीवी” = जीवित रहने वाले/ जीवन, अस्तित्व इन्हीं से चलता है। प्रतिजीवी शरीर के। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ
आहार का परिणमन
7 धातुओं में आहार का परिणमन भोजन से नहीं, जठराग्नि से होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8)
सूतक / तीर्थयात्रा
सूतक में शिखर जी आदि की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि वहाँ पदचिन्ह हैं, मूर्तियों को छूना/ उनकी पूजा नहीं है। गुल्लक में दान
पंचशील
बौद्ध मत का पाँचवाँ शील बताया है…. मद्यपान-विरति, जैन दर्शन में पाँचवाँ……………………………… अपरिग्रह। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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