Category: पहला कदम

स्व-पर कल्याण

आचार्य श्री ज्ञानसागर जी* फल (धर्म-पुरुषार्थ) खाकर चले गए। गुठली भी बोई (आचार्य श्री विद्यासागर जी)/ पौधे को सँवारा, विकसित भी कर गए। जिस पर

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प्रमाद

प्रमाद जीतने के उपाय … विकथा –> शास्त्रानुसार भाषण या मौन। कषाय –> कलुषित भावों की निंदा करें/ क्षमा धारण करें। विषयासक्ति –> लोकनिंदा का

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आयु

देव, नारकी तथा भोगभूमिज की आयु बहुत बड़ी-बड़ी, मनुष्य/ तिर्यंच की कम क्यों ? मनुष्य/ तिर्यंच संयम ले सकते हैं और संयम लेने के लिए

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ज्ञान

ज्ञान तो बस ज्ञान है। माध्यम/ ग्रहण करने वाला सम्यक्/ मिथ्या हो सकता है। मुनि श्री मंगलसागर जी

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रोना

अपने गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि होने पर शिष्य रोये। मुनि को रोना चाहिए ? नहीं, लेकिन रोओ तो चंदनबाला जैसा कि भगवान

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दोष

1. अतिक्रम –> मन की शुद्धि में कमी। 2. व्यतिक्रम –> मन से मर्यादा उल्लंघन। 3. अतिचार –> अज्ञान/ प्रमादवश विषय में प्रवृत्ति। 4. अनाचार

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द्वितीयोपशम सम्यक्त्व

द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के साथ कौन से स्वर्ग में जाते हैं ? पहले से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक, किसी में भी। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी</span

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प्रमाद / हिंसा

कोई व्यक्ति सिर्फ़ बैठा है, इसमें हिंसा कैसे घटित होगी ? प्रमाद में बस बैठने से अपने समय/ मन का दुरुपयोग कर रहा है। भाव/

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ऋषभनाथ भगवान

ऋषभनाथ भगवान का चिन्ह बैल नहीं, क्योंकि बैल तो नपुंसक होता है। उनका चिन्ह है “वृषभ” (साँड़)। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी</span

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मैं

जिसमें मेरी आत्मा नहीं, वह “मैं” नहीं। (जैसे मकान, रिश्तेदार आदि)। क्षु. श्री सहजानंद जी</span

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मंगल आशीष

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