Category: पहला कदम

कर्म फल

कर्म अपना फल द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव के अनुसार देते हैं। वर्तमान में पहले तीन हमारे नियंत्रण में नहीं, पर हम भावों को सुधार

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श्रमण

श्रवण करके जो तप (अंतरंग) करें, वो श्रमण। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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मूलगुण

आचार्यों के मूलगुणों में 10 धर्म लिए, मुनियों के लिए क्यों नहीं ? आचार्यों को संघ चलाना होता है। उसमें क्रोध आदि आने की संभावना

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सूक्ष्म

सूक्ष्म जीवों को कोई कुचल नहीं सकता। यदि हम भावों से सूक्ष्म बन जाएँ तो कोई भी हमको आहत नहीं कर सकता है। चिंतन

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अशुभ / शुभ / अशुद्ध

जब अशुभ भाव आयें तब चिंतन करें… मैं तो शुद्ध आत्मा हूँ। शुभ होने का घमण्ड आये तो आत्मा के अशुद्ध पर्याय का। क्षु. सहजानन्द

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गोत्र

राजा श्रेणिक के नरक आयुबंध के समय नीच-गोत्र बंध हो रहा था। मरण के समय उच्च-गोत्र बंध क्योंकि वे चौथे गुणस्थान में थे। नरक गये

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दिव्यध्वनि

दिव्यध्वनि से ज्ञान तो मिलता ही है। इससे आहारदान भी क्योंकि भूख नहीं लगती। औषधि दान भी, क्योंकि बीमारी नहीं आती। अभयदान, क्योंकि वहाँ डर

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पाप

पाप भी दो रूप –> विनाश रूप। विकास रूप/ समाज की मान्यता प्राप्त। जैसे कानून के तहत फाँसी, सूकर शेर को मारकर ५वें स्वर्ग गया,

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श्रावक

आचार्य श्री विद्यासागर जी के दर्शन करने एक धनाढ्य व्यक्ति आये। आचार्य श्री –> सेठ जी आ गए ? सेठ –> सेठ नहीं महाराज, भक्त।

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दृढ़ता

जिनके अंदर दृढ़ता होती है, वे ही देशव्रत/महाव्रत ले पाते हैं और उन्हें पाल पाते हैं। पर यह भी देखा गया है कि कुछ लोग

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मंगल आशीष

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