Category: पहला कदम
प्रमाद
प्रमाद…. कुशल (मंगलरूप, हितकारी कार्य) में अनादर। प्रमाद से ही व्यसन, व्रतों में दोष। प्रमाद होने पर विकथा आदि होने का नियम नहीं। लेकिन विकथा
ज्ञान
दो अक्षर का (छोटा सा) “ज्ञान”, तीन तीन अक्षरों(बडों) वाले “दर्शन” तथा “चारित्र” के बीच जैसे माता पिता के बीच बच्चा, ताकि उछल-कूद न करे।
मन वृद्ध
सब इंद्रियों की अपेक्षा अनिन्द्रिय मन सबसे वृद्ध और महत्वपूर्ण है। वह सब इंद्रियों को अपने अनुसार चलाना चाहता है, जैसे कुछ वृद्ध परिवार के
प्रासुक
प्रासुक…. “प्र”…. प्रगत ( निकल जाना)। “असु”…”असवः (प्राण)। प्रासुक होने पर स्पर्श, रस, गंध, वर्ण –> बदल जाएँ। जल गर्म/ उबालने से भी रस से
कायक्लेश
कायक्लेश…. चलाकर(बुद्धिपूर्वक) काय को क्लेश देना। बाईस परिषहों में से एक। तप का भेद। उपसर्ग अचानक आते हैं, परीषह के लिए पहले से तैयार रहते
विद्या गुरु मिल जाएँ
“…विनती हमारी है बड़े बाबा, विद्या गुरु मिल जाएँ…” – भजन (ब्र. सलौनी)। प्रश्न… गुरु तो स्वर्ग में, कैसे मिलें ? 1. हम ऐसा पुण्य
निर्माल्य
माली मेहनत करता है, बदले में मेहनताना निर्माल्य में नहीं आएगा। मन्दिर का सामान/ दुकान आदि हड़पना निर्माल्य में आएगा। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
बच गये या मर गये
एक प्रसिद्ध फ़िल्म में डाकुओं के सरदार ने तीन डाकुओं को गोली मारी पर तीनों बच गये, तीनों बहुत खुश हुए। अचानक सरदार ने तीनों
सल्लेखना
क्षु. श्री जिनेंद्र वर्णी जी की सल्लेखना आचार्य श्री विद्यासागर जी के सानिध्य में चल रही थी। एक दिन आचार्य श्री सम्बोधन देने देर से
आचार्य श्री विद्यासागर जी के अंतिम प्रवचन से
पंच परमेष्ठी का Short Form –> “ओंकाराय नमो नमः”। आचार्य श्री विद्यासागर जी
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