Category: पहला कदम

दुस्वर

ज्ञानी के भी दुस्वर कर्मोदय के समय, उनकी हितकारी बात भी सुनना नहीं चाहते। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/11 )

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निकांक्षित अंग

अनैतिक उपलब्धियों/ भोगविलास की इच्छा करना ही निकांक्षित-अंग में दोष है। सामान्य/ सांसारिक इच्छा रखने में दोष नहीं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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रस / नामकर्म

वनस्पतिकायिक जीवों के शरीर से खट्टे, मीठे, कषायले, कड़वे, तीखे रस आते हैं। त्रस जीवों के शरीर में भी इन जीवों का रस रहता है।

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शरीर / आत्मा

एकेन्द्रिय जीवों से हमारे शरीर की रक्षा/ पालन होता है। विकलेन्द्रियों तथा सकलेन्द्रिय तिर्यंचों के प्रति दया/ रक्षा के भावों से आत्मा की रक्षा। चिंतन

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आत्मा की शुद्धता

आत्मा को त्रैकालिक शुद्ध नहीं कह सकते हैं। आत्मा की शक्त्ति त्रैकालिक शुद्ध है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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जोड़ना/छोड़ना

चक्रवर्ती यदि सम्पदा छोड़े नहीं (दीक्षा लेकर) तो नरक जाता है। देवताओं पर तो अपार सम्पदा, छोड़ते नहीं, वे क्यों नहीं नरक जाते? जो जोड़ता

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समवसरण

भरत/ ऐरावत क्षेत्रों में समवसरण 12 योजन से लेकर 1 योजन तक के तथा विदेह क्षेत्रों में 12 योजन के ही होते हैं। निर्यापक मुनि

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धर्म

कहा है → “वस्तु का स्वभाव ही धर्म।” मेरा धर्म ? वस्तु के स्वभाव के अनुसार व्यवहार करना। चिंतन

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सल्लेखना

पंचम काल में 12 वर्ष की सल्लेखना उचित नहीं। निमित्त ज्ञानी का अनुमान ग़लत भी हो सकता है* तब नियम तोड़ने से, अकाल मरण का

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दर्शन-प्रतिमा

दर्शन-प्रतिमा में देवदर्शन से ज्यादा महत्वपूर्ण है शुद्ध/ सात्विक भोजन। देवदर्शन न मिलने पर एक स्थान पर बैठकर भगवान का चिंतवन करने से नियम पूरा

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मंगल आशीष

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