Category: पहला कदम

द्रव्य / पर्याय

द्रव्य तो सबका ज्ञानमय है। पाँचों ज्ञान सब में, प्रकट ज्ञानी के। पर्याय बदलने पर ही द्रव्य का मूल जैसे पत्थर में सोना‌, इंजीनियर तो

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साता

श्रावकों के असाता में पाप-बंध ही होता है (अपवादों को छोड़कर)। साता में पापबंध और पुण्यबंध, दोनों। चिंतन

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वैयावृत्ति

वैयावृत्ति अंतरंग तप क्यों ? क्योंकि इसमें मन की ग्लानि पर विजय, दूसरों के गुणों के प्रति आदर और मान गलन होता है। निर्यापक मुनि

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मैनासुन्दरी

इनके तो नाम में ही इनकी महानता छिपी है… “मैं ना सुन्दरी” !! मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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श्री कृष्ण जी

श्री कृष्ण जी की तीर्थंकर प्रकृति बंध गयी है, यह अभी निर्णीत नहीं है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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अंतरात्मा

आचार्य वीरसेन स्वामी जी की मनोरंजक/ विनोदपूर्ण युक्ति –> सिद्ध भगवान को बहिरात्मा कह सकते हैं क्योंकि वे कर्म रूपी गर्भ के बाहर हैं। संसारी,

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रागद्वेष

रागद्वेष में वासना आ जाती है, जो संसार बढ़ाने में निमित्त है। लेकिन रागद्वेष की एक समय की पर्याय वासना का रूप नहीं लेती। क्षु.

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विदेह

संदेह होगा, देह है तो देहाती, विदेह हो जा। आचार्य श्री विद्यासागर जी

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मोह

राग-द्वेष मोह की ही संतान हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

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मंगल आशीष

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