Category: पहला कदम
अवज्ञा
बच्चे हों या ग्राहक, आपकी बात न सुनने, न मानने और अपनी ही तानने का क्या कारण है ? 1) अभक्ष्य भक्षण 2) अपशब्दों का
स्वाध्याय
स्वाध्याय को परम-तप तभी कहा जा सकता है जब प्रशमता परम-श्रेणी की हो। मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 27 जून)
कर्म/जीव कांड
कर्मकांड में मुख्यता से कसायपाहुड से विषय लिए गए हैं जबकि जीवकांड में षट्खण्डागम की मुख्यता है। मुनि श्री सौम्य सागर जी ( जीवकांड गाथा
म्लेच्छ खण्ड
म्लेच्छ खण्ड में न सम्यक् धर्म है, न मिथ्या धर्म। (इसलिये वहाँ से आयी रानियों आदि को सम्यक् धर्म ग्रहण करने में दिक्कत नहीं होती
जिन शासन
जिनशासन तर्क-प्रधान नहीं, तर्क-संगत है । इसमें तर्क वितर्क नहीं चलते। मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 23 जून)
उपकार
बताया गया कि जीव जीव पर ही उपकार करता है। जिज्ञासा… जीव पुद्गल पर भी तो उपकार करता है जैसे चीजों को चमकाना/ सुरक्षित रखना
दसलक्षण में धर्म
बहुत से लोग दसलक्षण में ही धर्म करते हैं, फायदा ? यदि अभिप्राय धर्म सीखना है तब तो पूरा फायदा है। हाँ ! सिर्फ़ दस
स्वर
नाक के बायीं साइड से जो स्वर चलता है, उसे चंद्र-स्वर कहते हैं। यह दिन में चलने वाला स्वर है। रात्रि में दायीं साइड से
आवश्यक / अनायतन
6 आवश्यक, सम्यग्दर्शन पाने के लिए; 6 अनायतन, मिथ्यादर्शन से बचने के लिए। मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 15 जून) (आवश्यकों का पालन
वैराग्य
पं.सहजानंद जी ने आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा –> आपको वैराग्य कैसे हुआ ? आचार्य श्री –> भगवान/ गुरु के राग से। पं.जी ने
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