Category: पहला कदम
सल्लेखना
पंचम काल में 12 वर्ष की सल्लेखना उचित नहीं। निमित्त ज्ञानी का अनुमान ग़लत भी हो सकता है* तब नियम तोड़ने से, अकाल मरण का
दर्शन-प्रतिमा
दर्शन-प्रतिमा में देवदर्शन से ज्यादा महत्वपूर्ण है शुद्ध/ सात्विक भोजन। देवदर्शन न मिलने पर एक स्थान पर बैठकर भगवान का चिंतवन करने से नियम पूरा
अखंड-पाठ
अखंड-पाठ घर पर नहीं करना चाहिये। क्योंकि घर में मंदिर जैसी शुद्धि/ संयम नहीं रखा जा सकता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
शक्तितस तप
आदिनाथ भगवान 6 माह के उपवास का नियम लेकर ध्यान में बैठे। समय के साथ ध्यान की अवधि घटते-घटते, महावीर भगवान 2 दिन के बेले
नाक
हम नाक(नासा) के चक्कर में रहते हैं, इसलिये गिरते हैं। भगवान नासा-दृष्टि रखते हैं, सो उभरते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी
परीषह
परीषह आने पर हम अपने तथा धर्म के और ज़्यादा क़रीब हो जाते हैं: समता धारण करने पर संवर और निर्जरा होने लगते हैं। मुनि
चारित्र मोहनीय
चारित्र मोहनीय का क्षयोपशम पुण्योदय/ पापोदय में समता भाव रखने से होता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
दस-धर्म
श्रावकों के लिये दस धर्म, शिक्षा के लिये। मुनियों की तरह एकाशन, मौन, कम से कम पाप। मुनि श्री निर्वेगसागर जी
देशना / स्वाध्याय
मुनियों के प्रवचन… देशना लब्धि। वही विषय पण्डितों के मुख से… स्वाध्याय। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कर्म फल
कर्म अपना फल द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव के अनुसार देते हैं। वर्तमान में पहले तीन हमारे नियंत्रण में नहीं, पर हम भावों को सुधार
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