Category: पहला कदम
सिद्धांत-ग्रंथ
सिद्धांत-ग्रंथ उनको कहते हैं जिनका भगवान की देशना से सीधा संबंध हो। तत्त्वार्थ-सूत्र तो सिद्धांत-ग्रंथों की कुंजी है। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान
वैभव
पुण्य से वैभव मिलता है, जमा होने पर परिग्रह/पाप रूप कैसे हो जाता है? वैभव पुण्य कर्म-फल है। जमा करने पर उससे मोह हो जाता
शून्यता
लालची सब कुछ भरता जाता है क्योंकि उसके अंदर शून्यता/ अभाव है। सिद्ध भगवान परम शून्य हैं (कोई चाह नहीं बची)। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
कर्ता
मैं कर्ता हूँ … मन से विचारों का, वचन से शब्दों का, काय से अपने कर्मों का। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी
भगवान् महावीर की शेर पर्याय
भगवान् महावीर को शेर पर्याय में जब सम्यग्दर्शन हुया तब वे हिमवन पर्वत पर थे। पर्वत के किस भाग में, भोगभूमि या कर्मभूमि में ?
ज्ञान / चारित्र
सन 1977 में आचार्य श्री विद्यासागर जी का का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। पं. सहजानंद जी स्वाध्याय करा रहे थे। पेज नं. 77 पर आये
आभामंडलों का प्रभाव
यदि कोई सकारात्मक आभामंडल वाला नकारात्मक आभामंडल वाले के संपर्क में आए तो प्रभाव कैसा होगा? स्ट्रांग आभामंडल वाला कमज़ोर को प्रभावित करेगा। सकारात्मक आभामंडल
दर्शन
भगवान की मूर्ति में आँखों से तो पत्थर के ही दर्शन होते हैं, भगवान के तो ज्ञान से होते हैं। समवसरण में भी आँखों से
आभामंडल
हर जीवित और अजीवित वस्तु का अपना-अपना आभामंडल होता है (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक/ इलेक्ट्रोडायनेमिक)। यही अनुभव कराता है व्यक्तियों के साथ सकारात्मक/ नकारात्मक फीलिंग। इसमें कर्मसिद्धांत/ विज्ञान
चेतना
श्री पुरुषार्थ सिद्धि उपाय (गाथा-1) के अनुसार –> कर्म चेतना – रागादि रूप परिणमन कराती है। कर्म फल चेतना – सुख दुःख का अनुभव कराती
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