Category: पहला कदम
दिगम्बरत्व
वैदिक दर्शन में गांधारी ने दुर्योधन के शरीर को वज्र जैसा बनाने के लिये उसे दिगम्बरत्व धारण करने को कहा। अपूर्णता के कारण पूरा शरीर
पूजा
पूजा के अंत में “इत्याशीर्वाद” बहुत महत्त्वपूर्ण है। पूजा का फल –> प्रभु का अशीर्वाद (प्रभु के गुण पाने हेतु)। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
प्रमाद
8 प्रकार की शुद्धि(काय, भाव, भाषा, विनय, ईर्यापथ, भैक्ष, शयनासन, प्रतिष्ठापन) की कमी से प्रमाद आता है। प्रमाद से बचने के लिए 5 समिति, 3
अतिशय
अतिशय भक्तों की भक्ति से होते हैं, भगवान/ गुरु नहीं करते। भगवान के 34 अतिशय भक्तों के काम के नहीं। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
बुद्धि / अबुद्धि
पुरुषार्थ, विकास, विनाश बुद्धि पूर्वक तो होते ही हैं, अबुद्धि पूर्वक भी होते हैं। जैसे भरत चक्रवर्ती के 923 पुत्रों ने निगोद से मोक्ष तक
अविरति
1. अविरती के दो प्रकार का असंयम… i. प्राणी असंयम → षटकाय जीवों की रक्षा के भाव न होना। ii. इंद्रिय असंयम → मन +
आदान-निक्षेपण
आदान-निक्षेपण = ग्रहण-छोड़ना। आदान-निक्षेपण समिति से पाप कियाओं से पापास्रव की जगह पुण्यास्रव हो जाता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र)
स्वभाव
कहा है –> गुरु-उपदेश से वैराग्य होने पर रस बेरस लगने लगते हैं। तो क्या मिष्टान्न का मीठापन समाप्त हो जाता है? लालमणी भैया नहीं,
पूजन / विहार
50 लोग पूजन कर रहे हों या 50 मुनि विहार में चल रहे हों, प्रभावना किसमें ज़्यादा ? विहार में। कारण ? जैविक परमेष्ठि का
कर्म फलादि
आदिनाथ भगवान के महीनों के अंतराय (आहार में) को कर्म-फल मानें या कुछ और ? संयोग भी हो सकता है। पार्श्वनाथ भगवान के पिछले 10
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