Category: पहला कदम

द्रव्य का महत्व

समवसरण में पहले गुणस्थान वाले मुनि भी 13वें गुणस्थान वाले केवलियों के साथ एक कोठे में ही बैठते हैं। जबकि चौथे, पाँचवें गुणस्थान वाले श्रावक

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दान

“अनुग्रहार्थ स्वस्ताति सर्गो दानम्” अनुग्रह में दोनों पक्षों के गुणों में बढ़ोतरी। “स्वस्ताति” → स्व-धन के अतिसर्ग (त्याग) को दान कहते हैं। यहाँ धन या

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यंत्र / मंत्र / तंत्र

यंत्र —> पौद्गलिक का सहारा जैसे स्पीकर। मंत्र —> अदृश्य शक्ति का सहारा लेकर कार्य करना। तंत्र —> भावात्मक शक्ति का सहारा लेकर कार्य करना।

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उपयोग

क्षयोपशम का सम्यक् उपयोग सम्यग्दर्शन/ज्ञान को क्षायिक सम्यग्दर्शन/ज्ञान तक ले जाता है। मुनि श्री मंगलसागर जी मिथ्या उपयोग (जैसे हर समय T.V. आदि देखना) एकेंद्रिय

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अरहंत / सिद्ध

अरहंत –> ईश/ ऐश्वरवान/ मोक्षमार्ग के नेता। सामान्य केवली तथा सिद्धों के प्रतिहार्य नहीं होते। उन्हें ईश्वर भी नहीं कहते। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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पाठ्यक्रम

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने तत्त्वार्थ सूत्र, समयसार आदि के बाद मूलाचार पढ़ाया। आ.श्री की चर्या ही मूलाचार थी (पहले प्रैक्टिकल दिखाए ताकि समझ में

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केवली के निर्जरा

ऐसा लगता है कि 13वें गुणस्थान में आखिरी अंतर्मुहूर्त को छोड़कर सविपाक निर्जरा ही होती है। चिंतन

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मन

द्रव्य-मन… पौद्गलिक, भाव-मन… आत्मा की परिणति। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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“पर”

“पर” को अपना मानने की आदत नहीं छूट रही तो “पर” के घर आदि को अपना मान कर देख लो। क्षु. सहजानंद जी

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विद्याधरों को विद्या

विद्याधरों को 5 विद्याएँ कुल-परम्परा से मिलती हैं। आगे सिद्ध करके/ छीनकर ली जाती हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीवकांड गाथा – 360 )

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मंगल आशीष

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