Category: पहला कदम
समवसरण
कुबेर समवसरण को विक्रिया से क्यों नहीं बना लेते ? Real का Feel नहीं आयेगा। भगवान के लिये नकली का प्रयोग ? भक्त्ति की उत्कृष्टता।
नरक यहीं है
राजर्षि अमोघवर्ष कृत नीति ग्रंथ ‘प्रश्नोत्तर-रत्नमालिका’ से- “नरक क्या है?” “जहाँ सब कुछ परवश होकर किया जाता है।” सुख भी यदि परवश हो, तो सुख
इच्छा / उद्देश्य
इच्छा/ उद्देश्य किन का पूरा हो सकता है ? उद्देश्य पुण्यात्मा/ सम्यग्दृष्टि का ही पूरा हो सकता है। इच्छा मकान बनाने की कोई भी कर
दूध उबालना
दूध को 2-3 बार से ज्यादा नहीं उबालना चाहिये। क्योंकि अत्यंत गर्म होने पर अत्यंत गर्म प्रकृति वाले जीव और पैदा हो जाते हैं। क्षु.श्री
द्वीप / समुद्र
द्वीप/ समुद्र असंख्यात हैं पर नाम संख्यात ही हैं। इसलिये द्वीप/ समुद्रों के नाम असंख्यात बार Repeat होते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र
नया / पुराना
संसार में कुछ नया नहीं, कर्म भी (जो उदिष्ट हैं/ पंच परावर्तन पुनरावृत्ति है)। धर्म में नयापन है (क्योंकि हर क्षण भावों/ अनुभूति के अनुसार
पंचम गति
ऊपर वाली, संयम से प्राप्त। नीचे वाली (निगोद) असंयम से प्राप्त। छुटकारा –> पहला कदम – व्यसन त्याग। दुर्भाग्य –> सभ्यता के नाम पर व्यसनी
निश्चय-संघ
मनचाहा संघ परिवर्तन चाहने पर आचार्य श्री विद्यासागर जी ने अकेले रहने का आदेश दिया। विदा के समय आचार्य श्री ने कहा… निश्चय-संघ तो रत्नत्रय
छूने से अशुद्धि
मुनि को आहार को जाते समय यदि कोई भक्ति के अतिरेक/ अज्ञानतावश पैर छू ले तो अपवाद स्वरूप अशुद्धि नहीं मानना। आगम में कथानक आता
नियतिवाद
ईश्वरवाद से भी घटिया नियतिवाद है। क्योंकि ईश्वरवाद में नियति को बदलने का अधिकार एक (ईश्वर) को तो है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
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