Category: पहला कदम

विद्याधरों को विद्या

विद्याधरों को 5 विद्याएँ कुल-परम्परा से मिलती हैं। आगे सिद्ध करके/ छीनकर ली जाती हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जीवकांड गाथा – 360 )

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भगवान का श्वेत रक्त

प्रथमानुयोग के अनुसार भगवान का श्वेत रक्त होता है (5 कल्याणक वालों का)। लेकिन सिद्धान्त ग्रंथों में ऐसा वर्णन नहीं आता है। निर्यापक मुनि श्री

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परिणमन

परिणमन पर-निमित्तक भी तथा स्व-निमित्तक भी। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब बदलते रहते हैं, लेकिन दर्पण को आकाश की ओर कर दें तब भी दर्पण में

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जिन

जिन की भक्त्ति, जिन जिन ने की है, वे जिन बने। निर्यापक मुनि श्री योगसागर जी

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तप

तप/ ताप (गर्मी) से हम बहुत घबराते हैं। जबकि ताप के बिना न अनाज आदि पैदा होगा, ना ही उसे पचा (जठराग्नि) पाएंगे। आचार्य श्री

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जिनवाणी

जिनवाणी तो नय रूप है । लेकिन इसके निमित्त से सम्यग्दर्शन/ ज्ञान प्रमाण रूप प्राप्त किया जा सकता है । मुनि श्री मंगलसागर जी

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“पर” देखना

“पर” को देखना ही है तो उनको देखो जिन्होंने “पर” को देखना बंद कर दिया है। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी

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ध्रुवता

दीपक का प्रकाश(पुद्गल), बुझने पर पुद्गल रूप धुआँ/ अंधकार रूप लेना, प्रकाश की ध्रुवता है। स्वयंभू स्तोत्र – 24

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असाता

असाता करने से असाता का बंध होता है, चाहे वह धार्मिक क्रियाओं के लिए ही क्यों न हो । आधे जीवन तक असाता की तो

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दर्शन

अन्य दर्शन… ईश्वर (अवतार) प्रेरित। जैन दर्शन… चारित्र प्रेरित, सामान्य आदमी/ गुरु/ अरिहंत द्वारा। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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मंगल आशीष

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