Category: पहला कदम
अनर्थ-दंड
व्यर्थ नहीं वह साधना, जिसमें नहीं अनर्थ*। भले मोक्ष हो देर से, दूर रहे अद्य-गर्त।। आचार्य श्री विद्यासागर जी (सर्वोदय शतक) *अनर्थ-दंड।
पुरुष की स्पर्श क्षमता
पुरुष मनुष्य-लोक के हर भाग को स्पर्श कर सकता है। ऋद्धिधारी मुनियों से मनुष्य-लोक का कोई भाग अछूता नहीं रह जाता, स्त्री नहीं कर सकतीं
मानुषोत्तर पर्वत
मानुषोत्तर पर्वत पुष्कर-द्वीप के ठीक मध्य में नहीं है। बल्कि मनुष्य-लोक का आधा भाग निकल जाने/ पूरा हो जाने के बाद में है (मनुष्य की
Self-dependent / Independent
Self-dependent/Independent तो दो ही हैं… एक सिद्ध भगवान और दूसरा आकाश द्रव्य। मुनि श्री सौम्य सागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र-अध्याय 3 – अगस्त 30)
आस्रव / संवर
आचार्य श्री विद्यासागर जी का एक चिंतन… जैसे आस्रव का निरोध संवर है वैसे ही यह भी कहा जा सकता है कि संवर का निरोध
मार्दव धर्म
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… मार्दव धर्म मेज के कोने जैसा है, जिनको गोल कर दिया गया हो। इससे खुद भी सुरक्षित और
कर्म / दुःख
कर्म दुःख दे सकता है पर दुखी नहीं कर सकता वरना कर्म तो 10वें गुणस्थान के ऊपर भी हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन
चतुष्टय
स्वचतुष्टय = स्व(द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव)। स्वचतुष्टय से ही अनंतचतुष्टय । भाव ठीक नहीं पर दोष गढ़ते हैं बाकी 3(द्रव्य, क्षेत्र, काल) पर। अपनों के
सूतक
सूतक में दर्शन करने तो जाते ही हैं यानी फर्श को छूते हैं, जो नवदेवता में से एक है। फिर फर्श पर रखी हुई चीजें
क्षायिक-दान
सिद्धों में क्षायिक-दान कैसे घटित करेंगे ? सिद्धों को ध्यान/ अनुभूति में अपने पास लाकर अभय का अनुभव कर। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र
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