Category: पहला कदम
मोक्षमार्ग
पंचम काल का मोक्षमार्ग तो नर्सरी स्तर का है। कैसे ? शरीर पर मच्छर बैठते ही उड़ाने/ हटाने का भाव आ जाता है तो शेर
रागद्वेष
(शुद्ध) आत्मा में तो रागद्वेष होता ही नहीं है। कर्म (वर्गणा) में भी नहीं, वे तो Neutral होती हैं, रागद्वेष उनमें हम भरते हैं। चिंतन
सम्यग्दर्शन
चरणानुयोग के अनुसार सम्यग्दृष्टि का संसार लगभग अनन्त। करणानुयोग के अनुसार संसार बहुत थोड़ा सा, क्योंकि वह छटपटाता है। संसार कैसे भी छूटे ! निर्यापक
कर्म-फल
पुलिस जब सज़ा देती है तो दिखाई देती है तथा उनका डंडा भी, वेदना तो होती ही है। देवता दिखते नहीं सिर्फ़ डंडा दिखता है,
तप
श्रावक का तप –> अभक्ष्य त्याग से तप शुरू। रात्रिभोजन त्यागादि से तप बढ़ता चला जाता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
संगति
संगति –> निमित्त-नैमित्तिक संबंध। संगति से परिणाम, परिणाम से कषाय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
स्वाध्याय
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –> लोग क्रमबद्ध-पर्याय की बात तो करते हैं जिसका शास्त्रों में नाम भी नहीं है। पर “क्रमबद्ध-स्वाध्याय” की बात
ज्ञान
अवरोधों को दूर कर ज्ञान पाने में हमको मेहनत करनी पड़ती है, सम्यग्ज्ञानी को नहीं; क्योंकि यह आत्मा का स्वभाव है। क्षु.श्री सहजानन्द जी
आहार
सन् 1991 में मुक्तागिरी में आहार के बाद आचार्य श्री विद्यासागर जी ने शिष्यों को कहा –> पंचम काल है आहार के लिए उठना तो
मूलनायक
मूल –> मुख्य, जो प्रतिमा वेदी के बीच/ ऊपर विराजमान हो। मूलनायक का वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता। अकृत्रिम चैत्यालयों में तो एक वेदी पर
Recent Comments