Category: पहला कदम

नि:शल्यो व्रती

नि:शल्यो व्रती…. इसमें अणुव्रती/ महाव्रती दोनों आ जाएँगे। मोक्ष का भाव रखने वाले के शल्य समाप्त हो जाती है। जैनेतर व्रत ले सकते हैं पर

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लोक

लोक…. जितनी भी आकाशगंगा (गैलेक्सीज़) देखी जा सकीं हैं, उनसे बहुत ज़्यादा। जितने चाँद, तारे दिख रहे हैं, उनसे असंख्यात् गुणे, यह हुआ मध्यलोक। चाँद

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एकल विहार

दो मुनि साथ रहकर भी सारी क्रियाएँ अलग-अलग कर रहे हों तो भी भगवान की आज्ञा (एकल विहार नहीं कर रहे) मानने से असंख्यात गुणी

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ज्ञान

ज्ञान जो स्वयं को जाने। कुज्ञान जो “पर” को जाने।। चिंतन

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अनुजीवी

“अनु” = अनुरूप/ उनमें हमारे प्राण। “जीवी” = जीवित रहने वाले/ जीवन, अस्तित्व इन्हीं से चलता है। प्रतिजीवी शरीर के। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ

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आहार का परिणमन

7 धातुओं में आहार का परिणमन भोजन से नहीं, जठराग्नि से होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8)

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सूतक / तीर्थयात्रा

सूतक में शिखर जी आदि की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि वहाँ पदचिन्ह हैं, मूर्तियों को छूना/ उनकी पूजा नहीं है। गुल्लक में दान

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पंचशील

बौद्ध मत का पाँचवाँ शील बताया है…. मद्यपान-विरति, जैन दर्शन में पाँचवाँ……………………………… अपरिग्रह। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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जैनदर्शन

जैनदर्शन न द्वैतवादी है, ना ही अद्वैतवादी है। द्वैतवादी संश्लेष तथा संयोग संबंधों को मानते हैं, अद्वैतवादी दोनों को नहीं। जैनदर्शन तो इन दोनों संबंधों

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मंगल आशीष

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