Category: पहला कदम
स्वाध्याय
श्रावकों के लिये प्राचीन शास्त्रों* का स्वाध्याय करने को नहीं कहा, यह तो मुनियों के लिए था। श्रावकों को तो पूजा, आरंभिक हिंसा तथा परिग्रह
भक्त-प्रत्याख्यान
भक्त-प्रत्याख्यान… आहार क्रमश: से छोड़ते हुए समाधि। संघ की जिम्मेदारियों को छोड़कर समाधि ग्रहण करना। (आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि दोनों दृष्टि से ऐसी
भगवान से संवाद
भगवान से भी तू-तू, मैं-मैं हो सकती है। जो तू है, वह मैं बन सकता हूँ, पर जो मैं हूँ वह तू नहीं बन सकता।
मोक्षमार्ग
पंचम काल का मोक्षमार्ग तो नर्सरी स्तर का है। कैसे ? शरीर पर मच्छर बैठते ही उड़ाने/ हटाने का भाव आ जाता है तो शेर
रागद्वेष
(शुद्ध) आत्मा में तो रागद्वेष होता ही नहीं है। कर्म (वर्गणा) में भी नहीं, वे तो Neutral होती हैं, रागद्वेष उनमें हम भरते हैं। चिंतन
सम्यग्दर्शन
चरणानुयोग के अनुसार सम्यग्दृष्टि का संसार लगभग अनन्त। करुणानुयोग के अनुसार संसार बहुत थोड़ा सा, क्योंकि वह छटपटाता है। संसार कैसे भी छूटे ! निर्यापक
कर्म-फल
पुलिस जब सज़ा देती है तो दिखाई देती है तथा उनका डंडा भी, वेदना तो होती ही है। देवता दिखते नहीं सिर्फ डंडा दिखता है,
तप
श्रावक का तप –> अभक्ष्य त्याग से तप शुरू। रात्रिभोजन त्यागादि से तप बढ़ता चला जाता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
संगति
संगति –> निमित्त-नैमित्तिक संबंध। संगति से परिणाम, परिणाम से कषाय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
स्वाध्याय
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे –> लोग क्रमबद्ध-पर्याय की बात तो करते हैं जिसका शास्त्रों में नाम भी नहीं है। पर “क्रमबद्ध-स्वाध्याय” की बात
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