Category: पहला कदम
शरीर / आत्मा
एकेन्द्रिय जीवों से हमारे शरीर की रक्षा/ पालन होता है। विकलेन्द्रियों तथा सकलेन्द्रिय तिर्यंचों के प्रति दया/ रक्षा के भावों से आत्मा की रक्षा। चिंतन
आत्मा की शुद्धता
आत्मा को त्रैकालिक शुद्ध नहीं कह सकते हैं। आत्मा की शक्त्ति त्रैकालिक शुद्ध है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
जोड़ना/छोड़ना
चक्रवर्ती यदि सम्पदा छोड़े नहीं (दीक्षा लेकर) तो नरक जाता है। देवताओं पर तो अपार सम्पदा, छोड़ते नहीं, वे क्यों नहीं नरक जाते? जो जोड़ता
समवसरण
भरत/ ऐरावत क्षेत्रों में समवसरण 12 योजन से लेकर 1 योजन तक के तथा विदेह क्षेत्रों में 12 योजन के ही होते हैं। निर्यापक मुनि
धर्म
कहा है → “वस्तु का स्वभाव ही धर्म।” मेरा धर्म ? वस्तु के स्वभाव के अनुसार व्यवहार करना। चिंतन
सल्लेखना
पंचम काल में 12 वर्ष की सल्लेखना उचित नहीं। निमित्त ज्ञानी का अनुमान ग़लत भी हो सकता है* तब नियम तोड़ने से, अकाल मरण का
दर्शन-प्रतिमा
दर्शन-प्रतिमा में देवदर्शन से ज्यादा महत्वपूर्ण है शुद्ध/ सात्विक भोजन। देवदर्शन न मिलने पर एक स्थान पर बैठकर भगवान का चिंतवन करने से नियम पूरा
अखंड-पाठ
अखंड-पाठ घर पर नहीं करना चाहिए। क्योंकि घर में मंदिर जैसी शुद्धि/ संयम नहीं रखा जा सकता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
शक्तितस तप
आदिनाथ भगवान 6 माह के उपवास का नियम लेकर ध्यान में बैठे। समय के साथ ध्यान की अवधि घटते-घटते, महावीर भगवान 2 दिन के बेले
नाक
हम नाक(नासा) के चक्कर में रहते हैं, इसलिए गिरते हैं। भगवान नासा-दृष्टि रखते हैं, सो उभरते हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी
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