Category: पहला कदम

काय-क्लेश / परिषह / उपसर्ग

काय-क्लेश में चलाकर काय को क्लेश दी जाती है। परिषह आतीं हैं उन पर मुनिराज जय प्राप्त करते हैं। उपसर्ग अचानक आते हैं। निर्यापक मुनि

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ज्ञान / तटस्थता

ज्ञान तटस्थता के अनुपात में आता है। केवलज्ञान तक तो समझ आता है, बाद में प्रवचन के बारे में कैसे समझें ? गिलास भर जाने

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धर्म बढ़ाना

सांसारिक कार्यों को करते हुए धर्म कैसे बढ़ाएँ ? धर्म है क्या ? वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। सांसारिक क्रियाएँ करते हुए वस्तुओं (जीव,

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सुखी-दु:खी

आगमानुसार जीव सुख-दु:ख का भोक्ता है। यह भी कहा… यदि सुखी-दु:खी माना तो मिथ्यात्वी! दोनों को कैसे घटित करें ? सम्यग्दृष्टि जीव भी सुख-दु:ख तो

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पुद्गल परावर्तन

पुद्गल परावर्तन दो प्रकार… कर्म पुद्गल परावर्तन। नोकर्म पुद्गल परावर्तन। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – अध्याय 8)

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मंगलाचरण

मंगलाचरण में 6 अधिकार (चीजें) होती हैं… जैसे द्रव्यसंग्रह के मंगलाचरण में… मंगल…जो पुण्य ले आए/ पापों को गलाये। यहाँ श्री ऋषभदेव भगवान का नाम।

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कर्मबंध

नो-कर्मबंध के हेतु -> परिवारजन/ शरीर। नो-कर्मबंध टूटने पर कर्मबंध टूटते हैं, कर्मबंध टूटने पर नो-कर्मबंध टूटते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र – अध्याय

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श्रावक

श्रावक… पाक्षिक श्रावक…भगवान का पक्ष, अणुव्रत नहीं, सप्तव्यसन त्यागी, अष्ट मूलगुणधारी, 4 गुणस्थान। नैष्ठिक श्रावक…भोजन/ पानी मर्यादित, प्रतिमाधारी, 5 गुणस्थान। साधक श्रावक… सल्लेखना अभ्यासी/ प्राप्ति।

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स्वाध्याय

श्रावकों के लिये प्राचीन शास्त्रों* का स्वाध्याय करने को नहीं कहा, यह तो मुनियों के लिए था। श्रावकों को तो पूजा, आरंभिक हिंसा तथा परिग्रह

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भक्त-प्रत्याख्यान

भक्त-प्रत्याख्यान… आहार क्रमश: छोड़ते हुए समाधि। संघ की जिम्मेदारियों को छोड़कर समाधि ग्रहण करना। (आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि दोनों दृष्टि से ऐसी ही

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मंगल आशीष

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