Category: पहला कदम
धन / ज्ञान
एक देवता यदि आपको वरदान दे कि कल अंबानी बना दूंगा पर ज्ञान छीन लूंगा, तो लाभ क्या? अम्बानी होने का बोध ही न हो
भाव
1. औदयिक भाव….. भरपूर भोक्ता, जैसा मिला खाया। 2. औपशमिक भाव…. मिर्ची वाले भोजन में शक्कर मिलाकर। 3. क्षायोपशमिक भाव… बड़ी मिर्ची (सर्वघाती प्रकृति) निकालकर,
भय/अभय
शेर का बच्चा गीदड़ों के साथ रहकर भी सुखी रहता है, शेरों के पास भी सुखी। तो फ़र्क क्या हुआ? गीदड़ों के पास भयभीत रहता
भावना
वचन कैसे ? जैसा मेरा स्वभाव। मैं कहाँ ? जहाँ मेरा उपयोग। (तारण पंथ) किसी को पुण्य/ पाप फल उसकी भावनाओं से या निष्कर्ष से
धर्म
धर्म कैसे बढ़ाएँ ? धर्म क्या है ? वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। अपने जीवन से विभाव कम करते जाएँ। स्वभाव प्रकट होता जाएगा
सम्यग्दर्शन के अंग
सम्यग्दर्शन के पहले 4 अंग/ भाव (निशंकितादि) स्वाश्रित हैं। अगले 4 (उपगूहनादि) पराश्रित। यदि पहले 4 संभाल लिए तो अगले 4 आसानी से संभल जाएँगे।
नि:शल्यो व्रती
नि:शल्यो व्रती…. इसमें अणुव्रती/ महाव्रती दोनों आ जाएँगे। मोक्ष का भाव रखने वाले के शल्य समाप्त हो जाती है। जैनेतर व्रत ले सकते हैं पर
लोक
लोक…. जितनी भी आकाशगंगा (गैलेक्सीज़) देखी जा सकीं हैं, उनसे बहुत ज़्यादा। जितने चाँद, तारे दिख रहे हैं, उनसे असंख्यात् गुणे, यह हुआ मध्यलोक। चाँद
उत्पाद / व्यय / ध्रौव्य
उत्पाद = जन्म, पैदाइश। व्यय = नाश, ख़र्च। ध्रौव्य = नित्यता, स्थिरता। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
एकल विहार
दो मुनि साथ रहकर भी सारी क्रियाएँ अलग-अलग कर रहे हों तो भी भगवान की आज्ञा (एकल विहार नहीं कर रहे) मानने से असंख्यात गुणी
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