Category: पहला कदम

रोना

अपने गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि होने पर शिष्य रोये। मुनि को रोना चाहिए ? नहीं, लेकिन रोओ तो चंदनबाला जैसा कि भगवान

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दोष

1. अतिक्रम –> मन की शुद्धि में कमी। 2. व्यतिक्रम –> मन से मर्यादा उल्लंघन। 3. अतिचार –> अज्ञान/ प्रमादवश विषय में प्रवृत्ति। 4. अनाचार

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द्वितीयोपशम सम्यक्त्व

द्वितीयोपशम सम्यक्त्व के साथ कौन से स्वर्ग में जाते हैं ? पहले से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक, किसी में भी। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी</span

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प्रमाद / हिंसा

कोई व्यक्ति सिर्फ़ बैठा है, इसमें हिंसा कैसे घटित होगी ? प्रमाद में बस बैठने से अपने समय/ मन का दुरुपयोग कर रहा है। भाव/

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ऋषभनाथ भगवान

ऋषभनाथ भगवान का चिन्ह बैल नहीं, क्योंकि बैल तो नपुंसक होता है। उनका चिन्ह है “वृषभ” (साँड़)। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी</span

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मैं

जिसमें मेरी आत्मा नहीं, वह “मैं” नहीं। (जैसे मकान, रिश्तेदार आदि)। क्षु. श्री सहजानंद जी</span

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आत्मा

आत्मा एकत्व(अपने में पूर्ण लीन), विभक्त(अन्य से भिन्न) रूप है। क्षु. श्री सहजानंद जी

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चोरी

परमार्थ में चोरी… “पर” को अपना मानना। क्षु. श्री सहजानंद जी

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भक्ति

शुद्धोपयोग में शुद्ध की अनुभूति, भक्ति में भगवान बनने की। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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अनर्थदण्ड विरत

अनर्थदण्ड विरत = मन, वचन और काय की कुचेष्टाओं का त्यागी। अनर्थ = निष्प्रयोज्य। दण्ड = मन, वचन और काय की कुचेष्टाएँ। विरत = उदासीन,

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मंगल आशीष

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