Category: डायरी

जिंदा

हम शरीर से ही पूरे जिंदा दिखते हैं। मन से आधे (क्योंकि कोई भी हमारा मन तोड़ जाता है)। आत्मा से तो हम पूरे ही

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संसार

कत्ती* सूत भिगोकर लाई, बनिया ने मारी बट्टी**। बनिया कहे मैंने कत्ती लूटी, कत्ती कहे मैंने बनिया। प्रभात जैन की दादी जी * चरखे पर

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आश्रम

राग से निवृत्ति के लिये ——–> वानप्रस्थ आश्रम। वीतरागता में प्रवृत्ति के लिये –> व्रती आश्रम।

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सुख-दु:ख / आदत

सुख-दु:ख तथा आदत में क्या संबंध है ? गरीब को महल में नींद नहीं दुखी, अमीर झोंपड़ी में नींद नहीं तो दुखी। ब्र. डॉ. नीलेश

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छोड़ना

भगवान महावीर से पूछा…छोड़ा क्या ? वह जो मेरा था ही नहीं। घर का आसान पता है कि घर है ही नहीं। ब्र. डॉ. नीलेश

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मंदिर

जब कण-कण में भगवान है तो मंदिर जाना क्यों ? हवा तो धूप में भी पर उसका आनंद छाँव में ही क्यों / कार में

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मंगल आशीष

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