Category: डायरी

आलस / हिंसा

विचार किया !… जरा से आलस से (बिजली न जलाना/ लापरवाही से चलना) हम अपने जूतों के नीचे कितने कीड़ों की लाशों को लेकर घूम

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मृत्यु में वेदना

क्या मृत्यु में वेदना होती है? (एन. सी. जैन – नोयडा) नहीं बीमारी/ Accident की वेदना हो सकती है। पक्षियों आदि को देखें कितनी शांति

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संयम

खुले जंगल/ पहाड़ी पर रहने वाले लोग भी बाउंड्री खींच/ बना लेते हैं। लाभ ? स्वामित्व का अधिकार पा ही लेते हैं। ब्र. डॉ. नीलेश

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निरंतरता

यदि धर्म पुस्तकों पर बहुत दिनों तक दिमाग(Dimag) न लगाया जाए तो, उन पर दीमग(Demag)(दीमक) लग जाती है। दीमग(दीमक) का स्वभाव होता है कि वह

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कषाय

चारों कषायें इंटरचेंजेबल हैं। मान की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध आ जाता है, क्रोध से सफलता नहीं मिलती तो मायाचारी करने का लोभ आता

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परम्परा

परम्परा का कर्ज़ लिया नहीं चुकाना होता है। प्रो. शर्मा जी – जब दिगम्बर साधु न हों तब नकली साधु बनाकर इस परम्परा को बनाये

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आदर

न्यूनतम अनादर (दुश्मन/ सूक्ष्म जीवों का भी) करने वाला ही अधिकतम आदर का पात्र होता है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया

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पद / प्रतिभा

पद मिले, प्रतिभा न रहे तो धृतराष्ट्र बनते हैं। प्रतिभा रहे, पद न मिले तो कर्ण। (सुरेश – इंदौर)

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भूत / भविष्य

भूत को यदि नहीं भुलाओगे तो भविष्य भूलना पड़ेगा। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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समाधि

उपधि = परिग्रह। उपाधि = बौद्धिक बीमारी, मेंटल नहीं। बुद्धि को मेन्टेन नहीं कर पा रहा, इसीलिए तो उपाधि चाहिए। इन दोनों से जब व्यक्ति

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मंगल आशीष

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