Category: पहला कदम
परीषह
परीषह आने पर हम अपने तथा धर्म के और ज्यादा क़रीब हो जाते हैं: समता धारण करने पर संवर और निर्जरा होने लगते हैं। मुनि
चारित्र मोहनीय
चारित्र मोहनीय का क्षयोपशम पुण्योदय/ पापोदय में समता भाव रखने से होता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
दस-धर्म
श्रावकों के लिए दस धर्म, शिक्षा के लिए। मुनियों की तरह एकाशन, मौन, कम से कम पाप। मुनि श्री निर्वेगसागर जी
देशना / स्वाध्याय
मुनियों के प्रवचन… देशना लब्धि। वही विषय पण्डितों के मुख से… स्वाध्याय। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कर्म फल
कर्म अपना फल द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव के अनुसार देते हैं। वर्तमान में पहले तीन हमारे नियंत्रण में नहीं, पर हम भावों को सुधार
मूलगुण
आचार्यों के मूलगुणों में 10 धर्म लिए, मुनियों के लिए क्यों नहीं ? आचार्यों को संघ चलाना होता है। उसमें क्रोध आदि आने की संभावना
सूक्ष्म
सूक्ष्म जीवों को कोई कुचल नहीं सकता। यदि हम भावों से सूक्ष्म बन जाएँ तो कोई भी हमको आहत नहीं कर सकता है। चिंतन
अशुभ / शुभ / अशुद्ध
जब अशुभ भाव आएँ तब चिंतन करें… मैं तो शुद्ध आत्मा हूँ। शुभ होने का घमण्ड आए तो आत्मा के अशुद्ध पर्याय का। क्षु. सहजानन्द
गोत्र
राजा श्रेणिक के नरक आयुबंध के समय नीच-गोत्र बंध हो रहा था। मरण के समय उच्च-गोत्र बंध क्योंकि वे चौथे गुणस्थान में थे। नरक गए
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