पुरुषार्थ पहले या भाग्य ?

सुभाष

भाग्य से ही पुरुषार्थ कर पाते हैं। तब और ज्यादा अच्छा भाग्य बन जाता है,
फिर ज्यादा पुरुषार्थ कर पाते हैं।
जैसे पूँजी (भाग्य) लगाने से व्यवसाय (पुरुषार्थ)।
पूँजी बढ़ती जाती है, साथ-साथ व्यवसाय भी।

चिंतन

कुम्हार अपने 5 गधों पर 5 सामग्रियाँ Overload करके रोज़ाना बेचने जाता था।

    • अत्याचार –> राजा आदि के लिए।
    • अहंकार –> सेठ आदि, नये धनपतियों के लिए।
    • ईर्ष्या –> नये पण्डितों/ ज्ञानियों के लिए।
    • बेईमानी –> व्यापारियों के लिए।
    • छल-कपट/ मायाचार –> महिलाओं के लिए।

खरीदने वाले हम ही तो हैं।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

कार के टायर के नीचे आने से पैर कुचल गया।
पर टायर तो रबड़ का और रबड़ मुलायम ?
हवा भर दी सो कठोर हो गया।

मनुष्य में भी हवा भर दो तो वह कठोर हो जाता है। अन्यथा उसका स्वभाव तो
कोमल/ विनम्र होता है।

चिंतन

शाबाशी अच्छे/ बुरे कामों पर भी। इससे अहंकार आता है।
आशीष सिर्फ अच्छे कामों के लिये ही। इससे अहंकार घटता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

कर्म चोर बहु फिरत हैं…
यह कहावत सही नहीं है। कर्म तो साहूकार हैं, उनका कर्ज़ा कभी चुकता नहीं है।

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

(सही कहा है…ब्याज दर ब्याज लगती जाती है, एक कर्म उदय में आया, हमने रागद्वेष किया। कटा एक, बंधे चार)।

चिंतन

बच्चा माता पिता के बीच सो रहा है, सर्वाधिक सुरक्षित महसूस करता है। स्वप्न में शेर उसे खाने आया।
बचाएगा कौन ?
कोई संबंधी नहीं। सिर्फ़ जगना ही बचा सकता है।

चिंतन

राजा के प्रिय मंत्री की गलती पर राजा को सजा तो देनी ही थी।
सैनापति की राय थी – 1 लाख मुद्रा 100 कोड़े, सैनिक की 1 हजार मुद्रा 10 कोड़े, भिखारी की 10 मुद्रा , 1 दिन भोजन नहीं।
सबके अपनी बुद्धि/स्तर के अनुसार मापदंड थे।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

क्या भगवान भक्तों की ही इच्छा-पूर्ति करते हैं, या जो भी शरण में आता है, उसकी?
भगवान किसी की भी इच्छा-पूर्ति नहीं करते। जो भी विश्वास के साथ उनकी शरण में जाता है, उसकी इच्छाएँ ही समाप्त हो जाती हैं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

सामने वाले में अच्छाई दिखे तो उसे सच्चाई मानो (भरोसा, परखकर)।
अपनी अच्छाई के पीछे सच्चाई परखो।
परिवार/ समाज में सच्चाई को गौण कर अच्छाई को प्रमुखता दें।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

आकांक्षा का नुक़सान… संसार तथा परमार्थ दोनों में फल पर दृष्टि रहती है सो धर्म/ कर्तव्य पर कम हो जाती है।
इससे विशुद्धि/ शांति भी कम हो जाती है।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थसूत्र 7/23)

रुलाना….
किसी को रुलाने का पाकीज़ा तरीका… हँसाओ इस क़दर कि पानी निकल आये,
हम तो दुश्मन को भी पाकीज़ा सज़ा देते हैं।
हाथ उठाते नहीं, नज़रों से गिरा देते हैं।

डॉ. ब्र. नीलेश भैया

मन्दिर जाना बन्द कर दिया क्योंकि वहाँ झगड़े/ विसंवाद होते हैं।
दुकान/ घर में भी तो होते हैं, वहाँ जाना/ रहना बन्द किया क्या?

मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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