

उत्तम शौच ( लोभ न करना ) :-
अपन आनन्द लें उस चीज़ का जो अपने को प्राप्त है ।
लेकिन जो अपने पास है वह दिखता नहीं, जो दूसरों के पास है हमें वह ही दिखता है।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी


- आर्जव धर्म , मायाचारी का उल्टा यानि सरलता ।
- मायाचारी व्यक्ति प्राय: साँप जैसा होता है, ऊपर से सुंदर और चिकना, पर अंदर से ज़हरीला और पकड़ में ना आने वाला ।
- आज कपट जीवन के हर खेल में घुसपैठ कर चुका है, यहाँ तक कि धर्म में भी ।
- कपट से हानि –
1. अविश्वसनीयता।
2. कभी ना कभी पकड़े जाते हैं और फिर ज़िंदगी नरक बन जाती है ।
3. शास्त्रानुसार अगले जन्म में जानवर बनते हैं ।
- जीवन से कपट कैसे दूर करें ?
1.स्पष्टवादी बनें ।
मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सो करिये ।
2. जीवन में सादगी लायें, अपनी आवश्यकतायें कम करें।
3. आत्मचिंतन करें – आत्मा का रूप शुद्ध है ।
4. अच्छे शास्त्रों का अध्ययन करने की आदत डालें ।
5. अपनी संगति ऐसे लोगों से रखें जो भौतिकवाद की दौड़ में ना हों ।
पं. रतनलाल बैनाड़ा जी – पाठ्शाला (पारस चैनल)

मान निम्न रूपों में आता है…
अहंकार
तिरस्कार
ईर्षा भाव के रूप में
क्या मान करना स्वाभाविक नहीं है ?
नहीं, अज्ञानता का परिणाम है ।
अपनी प्रशंसा, दूसरों की निंदा करना भी मान का ही रूप है ।
मान को अपने जीवन से हटाने के लिये दूसरों के गुणों की प्रशंसा करें, अपने दोषों को देखें, सोचें की आत्मा के अनंत गुण हैं, मुझमें अगर थोड़े से गुण आ गये तो मैं इसमें इतरा क्यों रहा हूँ !
और ज्ञाता दृष्टा बनकर रहें, हम सब अपने जीवन में विनयशीलता लायें और मान को हटायें ।

आज का दिन क्षमा का है ।
धर्म की शुरूआत क्षमा से ही होती है –
सब जीवों को मैं क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें ।
शुभकामनायें कि हम सब यह पर्व पूरी क्षमता और उत्साह से मनायें ।
जिन-जिन वस्तुओं/ सुविधाओं की कमी में श्रावक दु:खी होता है,
गुरु उन-उन के अभाव में सुखी रहकर दिखाता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
जलाशय के किनारे बड़े पेड़ भी सूखने लगते हैं ।
(परिग्रही आसपास वालों को भी पनपने नहीं देते)
आचार्य श्री विद्यासागर जी
तपस्वी का रूप मंगलकारी होता है और यदि सुंदरता भी हो तो सोने में सुहागा जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी का ।
शरीर को समय पर उचित भोजन देना अहिंसा है,
जैसे किसान असाढ़ की बरसात में बुवाई करने से नहीं चूकता है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
सामान्यत: घर में कचरा दिखायी नहीं देता है पर झाड़ू लगाने पर दिखने लगता है ।
ऐसे ही, आत्मनिरीक्षण करने पर दोष दिखने लगते हैं ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी

(मंजू)
बहुत दिनों से आपके घर पर किसी ने कब्ज़ा कर रखा हो तो घर छोड़ते समय तोड़फोड़ करके जाता है।
ऐसे ही कर्म जब आत्मा से निकलते हैं तो दु:खी करके तो जायेंगे ही।
पर हमको खुश होना चाहिये कि पिंड तो छूटा ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
पाप जिसे पापी चाहता हो,
बुरी वस्तु जिसे बुरा आदमी चाहता हो ।
साधु ऐसी वस्तुयें रखते ही नहीं जिस पर असंयमी की नियत बिगड़े ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
क्या 5 छिद्र वाले घड़े में पानी भरा जा सकता है?
हाँ, यदि उसे पानी में डुबोये रखा जाये तो।
5 इन्द्रियाँ, जीवन रूपी घड़े के छिद्र हैं,
फिर भी जीवन भरा रह सकता है यदि उसे भक्त्ति में सरोबार रखा जाय तो।
(श्रीमति शर्मा)
जब आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज से एक लंगोटी पहनने के लिये कहा तो उन्होंने दुर्योधन का हवाला देते हुऐ बताया – उसने अपनी माँ का कहना नहीं माना था सो उसका हश्र देखा!
साधु को जिनवाणी माँ का कहना मानना चाहिये या कषायीओं (कषाय करने वाले गृहस्थ) का!!
मुनि श्री सुधासागर जी
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