श्रमण भोगों को निष्परिग्रह-भाव से ग्रहण करते हैं, श्रावक परिग्रह-भाव से,
श्रमण को बढ़िया आहार भी रसना इंद्रिय को नियंत्रण करने का अभ्यास कराता है, श्रावक को अच्छा आहार हो या बुरा, सब रसना इंद्रिय को निमंत्रण का अभ्यास कराते हैं ।
मुनि श्री महासागर जी
मलाई कहाँ ?
अशांत दूध में, ना ।
प्रशांत बनो ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
रावण लंका में सुरक्षित था, राम से ज्यादा बलशाली सेना फिर भी राम क्यों जीते ?
क्योंकि रावण किसी की मानता नहीं था, अपने दादा/नाना तक की नहीं ।
राम ने सबकी, धोबी तक की बात मानी ।
ट्रकों के पीछे लिखा रहता है – “फिर मिलेंगे” ।
( फिर मिल कर क्या कर लोगे! )
जो जीवन/ धर्म/ गुरु मिले उसका सदुपयोग किया!
आचार्य श्री विद्यासागर जी
बाहर का कचरा ( अपशब्द/ Criticism ) झेलने की आदत डाल लो,
अंदर का कचरा अपने आप साफ होने लगेगा ।
चिंतन
छलनी ने सुई से कहा कि तेरे मुँह में छेद है ।
सुई – अपनी ओर तो देख ले, तेरे तो पूरे शरीर में छेद ही छेद हैं ।
जो अकल की बात को अकल में बैठा ले, वह अक्लमंद।
बुद्धू को अकल की बात बताओ तो उल्टा पड़ जाता है।
तुम क्यों बता रहे हो?
क्या मुझ में अकल नहीं है?
क्या हम सब भी गुरूओं/भगवान की बातों को उल्टा नहीं ले रहे?
चिंतन
मोक्षमार्ग दो ही हैं ।
1. साधना
2. आराधना
जब तक साधना नहीं कर पा रहे हो, तब तक आराधना तो करो ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
3 प्रकार की बुद्धि—
1) सात्विक – करनी/अकरनी, पाप/पुण्य का भेद करे।
2) तामसिक – अधर्म को धर्म, अकर्त्तव्य को कर्त्तव्य माने।
3) राजसिक – (अपने मद में) सही/गलत का भेद नहीं कर पाये।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
दु:ख अज्ञान में,
दु:ख का निवारण?…
अज्ञान समाप्त करके ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
अंध-विश्वास से शुरुवात घातक होती है।
विश्वास करने से पहले विचार/ ज्ञान/ विवेक लगायें।
अंत में तो विश्वास को अंधा होना ही पड़ता है यानि अन्य की तरफ से अंधे, तभी पूर्ण समर्पण संभव है।
यह अंध-विश्वास का सकारात्मक पहलू है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
साधु/ व्रती सदैव याद रखें >>
दीक्षा अपने बल/भरोसे पर ली जाती है, औरों/समाज के बल पर नहीं।
व्रती को अपने व्रतों के नियंत्रण में रहना चाहिये, समाज के नियंत्रण में नहीं।
इसके लिये साधु को गृहस्थों से दूरी बना कर रखना चाहिये।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
हाइकु ….
“पाँचों* की रक्षा मुट्ठी** में,
मुट्ठी बंधी, लाखों की मानी”
आचार्य श्री विद्यासागर जी
एकता – सहयोग, समन्वय, समादर, संरक्षण से आती है ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
* 1) उँगलियाँ
2) इंद्रियां
3) परमेष्ठी
** प्रण/ शपथ लेते समय की मुद्रा।
संसारियों को आनंद नहीं, मज़ा (मिर्च मसाले वाला) चाहिये।
मज़ा में कर्म बंधते हैं, आनंद में कटते/ घटते हैं।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
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