वैराग्य भाव आये पर संसारियों के साथ रहने की मजबूरी हो तो संसारियों को पता मत लगने देना वरना वे रहना दुश्वार कर देंगे ।
मुनि श्री सुधासागर जी
ध्यान आत्मा पर लगायें, शरीर पर नहीं ।
कारण ?
ध्यान एक पर केन्द्रित किया जाता है, आत्मा एक है, शरीर के अनेक अंग तथा शरीर पर ध्यान जाते ही उसके अनेक रोगों पर ध्यान चला जायेगा, आत्मा में तो रोग होते ही नहीं ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
प्रतिकार करना है तो सुख का करो, वरना सुविधाओं के आश्रित हो जाओगे ।
जिन्होंने किया, वे महान/ साधु/ भगवान बन गये जैसे राम/महावीर भगवान ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
जज सुनते ज्यादा हैं, बोलते कम, भेद-विज्ञान लगाकर सत्य पकड़ते हैं ।
फांसी का निर्णय देने के बाद कलम तोड़ देते हैं – अहिंसा का प्रतीक ।
वकील बोलते ही रहते हैं, सुनते कम हैं क्योंकि असत्य को छुपाना चाहते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
क्रियात्मक प्रवृत्ति तथा भावात्मक निवृत्ति को छोड़कर जो बचा, वह ध्यान कहलाता है ।
चिंतन
कार्य की सिद्धि के लिये पहले सम्बोधन करना चाहिये,
जैसे…
“बेटा ! ये काम कर दो” ।
इससे सकारात्मकता भी आयेगी ।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
जीवन की सारी दौड़ केवल अतिरिक्त के लिए है !
अतिरिक्त पैसा,
अतिरिक्त पहचान,
अतिरिक्त शौहरत,
अतिरिक्त प्रतिष्ठा !
यदि यह अतिरिक्त पाने की लालसा ना हो तो ….
जीवन कितना सरल हो जाय !
घोड़े के दो मालिक होते हैं – एक रईस*, दूसरा – सईस** ।
हम अपने शरीर रूपी घोड़े के कौन से मालिक हैं ?
मुनि श्री महासागर जी
* लगाम अपने हाथ में रखने वाला
** सेवा करने वाला
पसीना दो तरह का –
1. कसरत करने से शरीर के लिये लाभदायक ।
2. तप करने से आत्मा के लिये लाभदायक ।
चिंतन
आत्मा को भार* नहीं, आभार** मानो ।
* भार मानने वाले आत्मघात तक कर लेते हैं ।
** कितना उपकार कि आत्मा हमें मोक्ष-मार्ग पर लगाने में निमित्त है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
जग प्रशंसा करे तो गुण, ख़ुद को बताना पड़े तो अवगुण ।
अवगुणीं तुम्हारे गुणों को स्वीकार नहीं कर पायेंगे;
गुणीं पचा नहीं पायेंगे ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
भगवान भारत में ही क्यों ?
इस धर्म/संस्कृति की फसल के लिये ये ही वातावरण अनुकूल है ।
जैसे चाय के लिये आसाम, सेव के लिये कश्मीर ।
बाहर का वातावरण संसार बढ़ाने के लिये या कहें संसार किसी भी वातावरण में फलफूल सकता है ।
मुनि श्री सुधासागर जी
ट्रेन में 2 यात्रियों में झगड़ा मारपीट तक पहुंच गया ।
एक खिड़की बंद करता उसे सर्दी लग रही थी, दूसरा खोल देता क्योंकि उसे गर्मी ।
TTE को बुला लिया गया ।
TTE ने आकर देखा खिड़की में कांच ही नहीं था ।
झगड़ा सर्दी/गर्मी का नहीं, अहम् का था ।
(श्रीमति शर्मा)
साधना से प्रभावना होती ही है,
पर प्रभावना के लिये साधना करना उत्कृष्ट साधना नहीं ।
चिंतन
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