जो दौड़-दौड़ कर भी नहीं मिलता, वह संसार है;
जो बिना दौड़े मिलता है, वह भगवान है ।

(सुरेश)

भगवान को कर्ता मानने वाले कहते हैं – “ऊपर वाला पांसा फेंके, नीचे चलते दांव”,
कर्मों पर विश्वासी कहते हैं – “अंदर वाला पांसा फेंके, बाहर चलते दांव ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

हम भगवान के अंश नहीं हैं, ना ही भगवान के बाइ-प्राॅडक्ट हैं। बल्कि भगवान बनने का जो कच्चामाल होता है, वह हैं ।
बस, परिष्कार करना है, सांचे में ढालना है, ख़ुद भगवान बन जायेंगे ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

ख़ुशी से संतुष्टि मिलती है और संतुष्टि से ख़ुशी |
परन्तु दोनों में फ़र्क बहोत बड़ा है ….
ख़ुशी थोड़े समय के लिए संतुष्टि देती है,
पर संतुष्टि हमेशा के लिए ख़ुशी देती है ।

(सुरेश)

एकाग्रता यानि एक को अग्र बना कर ध्यान करना ।
केन्द्र पर केन्द्रित करो, परिधि पर सब तुम्हारे चक्कर काटेंगे ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

काया का कायल नहीं, काया में हूँ आज ।
कैसे काया-कल्प हो, ऐसा हो कुछ काज ।।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(हम तो आज चाय के भी कायल हैं)

Experiences are like waves,
They come to you on shore of life;
Drag the sand from beneath your feet,
But each wave makes you stand on a new base.

अनुभव लहर की तरह होते हैं,
जीवन के तट पर वे आपके पास आते हैं;
आपके पैरों के नीचे से रेत खींच लेते हैं,
लेकिन प्रत्येक लहर आपको एक नए आधार पर खड़ा करती है ।

(सुरेश)

कौन से कर्म बढ़ रहे हैं इसका पता कैसे लगे ?

क्रिया करने के बाद यदि सुकून/आनंद आ रहा है तो शुभ-कर्म बढ़ रहे हैं,
यदि आकुलता हो रही है तो अशुभ कर्म बढ़ रहे हैं ।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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