साधु, साधुता के अयोग्य आदतों को दूर करने की साधना में लगे हैं,
पर कभी कर्मों की ऐसी गठान आ जाती है, जहाँ साधना का cutter मौथरा हो जाता है/टूट जाता है ।
सारे तीर तो किसी के भी निशाने को बेध नहीं पाते हैं न !

मुनि श्री अविचलसागर जी

प्रण कब तक निभायें ?

प्रण निभाने में व्यक्तिगत लाभ होता है,
लेकिन वह प्रण जब समाज/देश/धर्म के लिये अहितकारी हो जाय तो तोड़ लेना चाहिये जैसे श्री कृष्ण करते थे ।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

सब विनयों में, उपचार-विनय (शिष्टाचार में) Practical है ।
इसमें 100% नम्बर सहजता से ला सकते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

स्मरण तथा पुण्यार्जन के लिये भुला-भुला कर पढ़ना चाहिये ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

विनय यानि सामने वाले के अनुकूल प्रवृत्ति करना ।
ख़ुद से पूछें…
क्या हम बड़ों/ गुरु/ शास्त्र और भगवान की विनय करते हैं ?

मुनि श्री अविचलसागर जी

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